हिंदी साहित्य के इतिहास में छायावाद एक स्वर्णिम युग के रूप में प्रतिष्ठित है। इस युग ने काव्य को आत्मानुभूति, प्रकृति-सौंदर्य, रहस्य-चेतना और मानवीय संवेदनाओं की नई दिशा प्रदान की। इस युग के चार प्रमुख स्तंभों—जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला—में जयशंकर प्रसाद का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। उन्होंने न केवल काव्य, बल्कि नाटक, उपन्यास और कहानी के क्षेत्र में भी अमिट छाप छोड़ी।
जयशंकर प्रसाद की काव्य-यात्रा का विकास क्रमिक और गहन है। ‘झरना’ और ‘आँसू’ जैसे प्रारम्भिक काव्य-संग्रहों से आगे बढ़ते हुए उनकी काव्य-दृष्टि जिस परिपक्वता तक पहुँचती है, उसका उत्कृष्ट उदाहरण है ‘लहर’। यह संग्रह छायावाद की भावुकता से निकलकर जीवन-दर्शन की व्यापक भूमि पर प्रतिष्ठित होता है।
‘लहर’ का प्रकाशन सन् 1935 ई॰ में भारती भंडार, इलाहाबाद से हुआ। यह कृति 1933-35 के मध्य रचित कविताओं का संग्रह है। इसमें प्रेम, प्रकृति, सौंदर्य, राष्ट्रप्रेम, ऐतिहासिक चेतना और दार्शनिक चिंतन का अद्भुत समन्वय है। यह केवल गीत-संग्रह नहीं, बल्कि एक परिपक्व कवि-मन की गहरी संवेदनात्मक और बौद्धिक यात्रा का दस्तावेज़ है।
‘लहर’ का साहित्यिक संदर्भ और महत्व
छायावादी काव्य के विकास में ‘लहर’ एक महत्वपूर्ण कड़ी है। यदि ‘झरना’ में प्रेम की कोमलता और ‘आँसू’ में करुणा की भावधारा दिखाई देती है, तो ‘लहर’ में वही भावधारा व्यापक जीवनानुभूति में रूपांतरित हो जाती है।
जिस प्रकार ब्रजभाषा में सूरदास की रचनाएँ आरंभिक होते हुए भी अपनी उत्कृष्टता से चमत्कृत कर देती हैं, उसी प्रकार ‘झरना’, ‘लहर’ और प्रसाद के नाटकों के गीतों को पढ़कर यह विश्वास करना कठिन हो जाता है कि खड़ी बोली हिंदी में ये प्रारंभिक गीत-रचनाएँ हैं।
‘लहर’ ने खड़ी बोली को गीतात्मक अभिव्यक्ति की परिष्कृत और संस्कृतनिष्ठ गरिमा प्रदान की। यह संग्रह सिद्ध करता है कि हिंदी में भी गीत केवल लोकधर्मी या सरल भाव-प्रवाह नहीं, बल्कि गहन दार्शनिक और सांस्कृतिक चेतना के वाहक हो सकते हैं।
‘लहर’ रचना-काल और प्रकाशन
‘लहर’ का प्रकाशन 1935 ई॰ में भारती भंडार, इलाहाबाद से हुआ। यह काल प्रसाद जी के प्रौढ़ रचनाकाल का समय था। इसी कालखंड में उनकी महान कृति ‘कामायनी’ का भी सृजन हुआ।
आलोचक रमेशचन्द्र शाह के अनुसार—
“इस संग्रह की कविताएँ एक परिपक्व कवि-मन और उसकी विकसित संवेदना का गहरा प्रमाण देती हैं और इस तरह ‘कामायनी’ का पूर्वराग हमें उनमें सुनाई देने लगता है।”
अर्थात् ‘लहर’ को ‘कामायनी’ की भावभूमि भी कहा जा सकता है। यहाँ कवि की संवेदना अधिक चिंतनशील, अधिक दार्शनिक और अधिक व्यापक हो जाती है।
‘लहर’ की प्रमुख कविताएँ
‘लहर’ में संकलित कविताओं को विषयगत आधार पर निम्न प्रकार विभाजित किया जा सकता है—
(1) प्रगीत (प्रेम, सौंदर्य एवं आत्मपरक गीत)
इन रचनाओं में प्रणय, विरह, स्मृति, कोमल भावनाएँ तथा आत्मानुभूति की अभिव्यक्ति मिलती है—
- उठ-उठ री लघु-लघु लोल लहर
- निज अलकों के अंधकार में तुम कैसे छिप आओगे
- मधुप गुनगुना कर कह जाता कौन कहानी यह अपनी
- ले चल वहाँ भुलावा देकर मेरे नाविक
- उस दिन जब जीवन के पथ में
- आह रे वह अधीर यौवन
- तुम्हारी आँखों का बचपन
- कोमल कुसुमों की मधुर रात
- वे कुछ दिन कितने सुन्दर थे
- मेरी आँखों की पुतली में
- अपलक जगती हो एक रात
- चिर तृषित कंठ से तृप्त विधुर
- काली आँखों का अंधकार
- अरे कहीं देखा है तुमने
- शशि सी सुन्दर वह रूप विभा
- अरे आ गयी है भूली सी
- निधरक तूने ठुकराया तब
ये कविताएँ छायावाद की मूल आत्मा—प्रकृति, प्रेम और रहस्यात्मक सौंदर्य—को व्यक्त करती हैं। इनमें लयात्मकता, संक्षिप्तता और सूक्ष्म अनुभूति का अद्भुत सामंजस्य है।
(2) जागरण एवं नवचेतना गीत
इन कविताओं में राष्ट्रीय चेतना, आत्मजागरण और नवप्रभात का आह्वान है—
- बीती विभावरी जाग री
- अब जागो जीवन के प्रभात
- जगती की मंगलमयी उषा बन
- अंतरिक्ष में अभी सो रही है ऊषा मधुबाला
- आँखों से अलख जगाने को
यह कविता केवल प्रातः-जागरण का गीत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय और आध्यात्मिक चेतना का आह्वान है। इसमें अंधकार से प्रकाश की ओर, निद्रा से जागृति की ओर बढ़ने का प्रतीकात्मक संदेश निहित है।
(3) प्रकृति एवं दार्शनिक चेतना
इन रचनाओं में प्रकृति के माध्यम से जीवन-दर्शन, विश्व-वेदना और सांस्कृतिक संकेत व्यक्त हुए हैं—
- अरी वरुणा की शान्त कछार !
- हे सागर संगम अरुण नील
- कितने दिन जीवन जलनिधि में
- जग की सजल कालिमा रजनी में
- वसुधा के अंचल पर
- मधुर माधवी संध्या में
- ओ री मानस की गहराई
इन कविताओं में प्रकृति केवल दृश्य-सौंदर्य का माध्यम नहीं है, बल्कि जीवन-दर्शन की अभिव्यक्ति का सशक्त प्रतीक बन जाती है। यहाँ प्रकृति के विविध रूपों के माध्यम से मानव-जीवन की नश्वरता, परिवर्तनशीलता और विश्व-वेदना का गहन संकेत मिलता है। कवि बाह्य जगत के सौंदर्य में आंतरिक अनुभूति और दार्शनिक चिंतन का समन्वय स्थापित करता है।
(4) ऐतिहासिक एवं राष्ट्रीय चेतना की कविताएँ
इन कविताओं में इतिहास, राष्ट्रगौरव, आत्ममंथन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का स्वर प्रमुख है—
- अशोक की चिन्ता
- शेरसिंह का शस्त्र समर्पण
- पेशोला की प्रतिध्वनि
- प्रलय की छाया
इन रचनाओं में इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रगौरव का सशक्त स्वर मुखरित हुआ है। कवि अतीत की घटनाओं और चरित्रों के माध्यम से वर्तमान समाज को आत्ममंथन और जागरण का संदेश देता है। यहाँ ऐतिहासिक प्रसंग केवल वर्णन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रेरक आधार बन जाते हैं।
‘लहर’ की संकलित रचनाएँ (विषयवार सारणी)
नीचे ‘लहर’ के अंतर्गत संकलित रचनाओं को विषयगत हेडिंग के अंतर्गत व्यवस्थित सारणी में प्रस्तुत किया गया है—
| क्रम सं. | कविता का नाम | श्रेणी / हेडिंग | प्रमुख भाव / विषय |
|---|---|---|---|
| 1 | उठ-उठ री लघु-लघु लोल लहर | प्रगीत (प्रकृति-गीत) | प्रकृति-सौंदर्य, लयात्मकता |
| 2 | निज अलकों के अंधकार में तुम कैसे छिप आओगे | प्रेम-प्रगीत | प्रणय, रहस्य |
| 3 | मधुप गुनगुना कर कह जाता कौन कहानी यह अपनी | प्रेम-प्रगीत | स्मृति, प्रणय |
| 4 | अरी वरुणा की शान्त कछार ! | प्रकृति एवं राष्ट्रप्रेम | सांस्कृतिक चेतना |
| 5 | ले चल वहाँ भुलावा देकर मेरे नाविक | प्रेम-प्रगीत | कल्पना, विरह |
| 6 | हे सागर संगम अरुण नील | प्रकृति-प्रगीत | प्रकृति, दार्शनिकता |
| 7 | उस दिन जब जीवन के पथ में | आत्मपरक गीत | जीवन-स्मृति |
| 8 | बीती विभावरी जाग री | जागरण गीत | राष्ट्रीय चेतना |
| 9 | आँखों से अलख जगाने को | आध्यात्मिक/दार्शनिक | आत्मजागरण |
| 10 | आह रे वह अधीर यौवन | प्रेम-गीत | यौवन-वेदना |
| 11 | तुम्हारी आँखों का बचपन | प्रेम-प्रगीत | कोमल भाव |
| 12 | अब जागो जीवन के प्रभात | जागरण/दार्शनिक | नवचेतना |
| 13 | कोमल कुसुमों की मधुर रात | प्रकृति-प्रेम गीत | सौंदर्य |
| 14 | कितने दिन जीवन जलनिधि में | दार्शनिक गीत | जीवन-चिंतन |
| 15 | वे कुछ दिन कितने सुन्दर थे | स्मृति-गीत | अतीत-चिंतन |
| 16 | मेरी आँखों की पुतली में | प्रेम-गीत | आत्मीयता |
| 17 | जग की सजल कालिमा रजनी में | प्रकृति-दार्शनिक | विश्व-वेदना |
| 18 | वसुधा के अंचल पर | राष्ट्रप्रेम/प्रकृति | धरती-मातृभाव |
| 19 | अपलक जगती हो एक रात | प्रेम-प्रगीत | प्रतीक्षा |
| 20 | जगती की मंगलमयी उषा बन | जागरण गीत | नवजीवन |
| 21 | चिर तृषित कंठ से तृप्त विधुर | विरह-गीत | पीड़ा |
| 22 | काली आँखों का अंधकार | प्रेम-गीत | रहस्यात्मक सौंदर्य |
| 23 | अरे कहीं देखा है तुमने | प्रेम-प्रगीत | खोज, आकर्षण |
| 24 | शशि सी सुन्दर वह रूप विभा | सौंदर्य-गीत | रूप-माधुरी |
| 25 | अरे आ गयी है भूली सी | स्मृति-गीत | पुनर्स्मरण |
| 26 | निधरक तूने ठुकराया तब | विरह-गीत | वेदना |
| 27 | ओ री मानस की गहराई | दार्शनिक गीत | आत्ममंथन |
| 28 | मधुर माधवी संध्या में | प्रकृति-गीत | सांध्य-सौंदर्य |
| 29 | अंतरिक्ष में अभी सो रही है ऊषा मधुबाला | प्रकृति-जागरण | प्रभात-चित्रण |
| 30 | अशोक की चिन्ता | ऐतिहासिक/सांस्कृतिक | आत्मसंघर्ष, इतिहास |
| 31 | शेरसिंह का शस्त्र समर्पण | ऐतिहासिक/राष्ट्रीय | त्याग, राष्ट्रभाव |
| 32 | पेशोला की प्रतिध्वनि | ऐतिहासिक/राष्ट्रीय | स्वाधीनता चेतना |
| 33 | प्रलय की छाया | ऐतिहासिक-दार्शनिक | विनाश और पुनर्निर्माण |
वर्गीकरण का संक्षिप्त संकेत
(1) प्रेम-प्रगीत:
व्यक्तिगत प्रेम, विरह, सौंदर्य और स्मृति से सम्बद्ध रचनाएँ।
(2) प्रकृति-प्रगीत:
प्रकृति के माध्यम से सौंदर्य एवं दार्शनिक संकेत।
(3) जागरण गीत:
राष्ट्रीय और आध्यात्मिक चेतना का आह्वान।
(4) दार्शनिक/आत्मपरक गीत:
जीवन-दर्शन, आत्ममंथन और विश्व-वेदना।
(5) ऐतिहासिक/सांस्कृतिक कविताएँ:
इतिहास और राष्ट्रभावना से सम्बद्ध रचनाएँ।
‘लहर’ का भाव पक्ष
1. प्रेम की व्यापकता
‘लहर’ में प्रेम केवल व्यक्तिगत प्रणय नहीं है। यह प्रेम धीरे-धीरे लोक-प्रेम और मानवता के प्रति करुणा में परिवर्तित हो जाता है। ‘झरना’ और ‘आँसू’ की निजी व्यथा यहाँ व्यापक जीवनानुभूति का रूप लेती है।
यहाँ प्रेम आत्मपरक होते हुए भी संकीर्ण नहीं है। वह विश्व-चेतना से जुड़ता है।
2. करुणा और विश्व-वेदना
प्रसाद की संवेदना अत्यंत कोमल है। किंतु ‘लहर’ में यह करुणा व्यक्तिगत सीमा से बाहर निकलकर विश्व-वेदना का रूप ले लेती है। कवि मानव जीवन की पीड़ा को व्यापक दृष्टि से देखता है।
यहाँ करुणा निष्क्रिय नहीं, बल्कि जागरण का माध्यम है।
3. राष्ट्रप्रेम और सांस्कृतिक चेतना
‘हिमाद्रि तुंग शृंग से’ जैसी कविताओं में भारतीय संस्कृति की गरिमा और राष्ट्रीय गौरव की भावना मुखर है।
‘पेशोला की प्रतिध्वनि’ और ‘शेरसिंह का शस्त्र समर्पण’ जैसी रचनाएँ स्वतंत्रता-संग्राम की पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय चेतना का स्वर प्रस्तुत करती हैं।
कवि अतीत की गौरव-गाथाओं के माध्यम से वर्तमान पीढ़ी को प्रेरणा देता है।
4. ऐतिहासिक दृष्टि
‘अशोक की चिन्ता’ और ‘प्रलय की छाया’ में इतिहास और कल्पना का सुंदर समन्वय है। प्रसाद इतिहास को केवल घटनाओं का क्रम नहीं मानते, बल्कि उसे मानव-चेतना का विकास मानते हैं।
उनके यहाँ इतिहास एक जीवित सत्ता है, जो वर्तमान को दिशा देता है।
5. दार्शनिक गाम्भीर्य
‘लहर’ में दार्शनिकता का गहरा पुट है। जीवन, मृत्यु, परिवर्तन, समय और नियति जैसे विषयों पर कवि का गंभीर चिंतन दिखाई देता है।
डॉ॰ प्रेमशंकर के अनुसार—
“लहर में कवि एक चिन्तनशील कलाकार के रूप में सम्मुख आता है, जिसने अतीत की घटनाओं से प्रेरणा ग्रहण की है।”
यहाँ भावोच्छ्वास के साथ-साथ जीवन-दर्शन की योजना भी है।
‘लहर’ का शिल्प पक्ष
1. प्रगीतात्मकता
‘लहर’ हिंदी साहित्य को श्रेष्ठ प्रगीत प्रदान करती है। प्रत्येक कविता में लय, संक्षिप्तता और भाव-सघनता है।
प्रसाद ने गीत को केवल भाव-प्रवाह न रहने देकर उसे दार्शनिक गहराई प्रदान की।
2. भाषा
‘लहर’ की भाषा संस्कृतनिष्ठ, परिष्कृत और तत्सम प्रधान है। किंतु इसमें कृत्रिमता नहीं है। शब्द-चयन अत्यंत सावधानी से किया गया है।
संस्कृतनिष्ठ शब्दावली काव्य को गंभीरता और गरिमा प्रदान करती है।
3. प्रतीक और बिंब
प्रकृति के माध्यम से गूढ़ भाव व्यक्त करना प्रसाद की विशेषता है।
लहर, सागर, हिमालय, प्रभात, छाया आदि प्रतीकात्मक अर्थ ग्रहण कर लेते हैं।
प्रकृति यहाँ केवल दृश्य नहीं, बल्कि भाव की अभिव्यक्ति का माध्यम है।
4. संगीतात्मकता
छायावादी काव्य की प्रमुख विशेषता संगीतात्मकता है। ‘लहर’ में यह गुण अत्यंत विकसित रूप में मिलता है।
छंद-विधान, लय और अनुप्रास के प्रयोग से कविताएँ अत्यंत मधुर बन गई हैं।
‘लहर’ और ‘कामायनी’ का संबंध
‘लहर’ को ‘कामायनी’ की पूर्वपीठिका माना जा सकता है।
यहाँ जो दार्शनिकता और मानव-चिंतन दिखाई देता है, वही आगे चलकर ‘कामायनी’ में विस्तृत रूप लेता है।
‘लहर’ में ‘स्व’ की अनुभूति धीरे-धीरे ‘लोक’ में विलीन होती दिखाई देती है। यही प्रवृत्ति ‘कामायनी’ में पूर्ण विकसित रूप में मिलती है।
आलोचकों की दृष्टि
- रमेशचन्द्र शाह ने इसे परिपक्व संवेदना का प्रमाण माना।
- डॉ॰ प्रेमशंकर ने इसमें जीवन-दर्शन की योजना देखी।
- डॉ॰ सत्यप्रकाश मिश्र के अनुसार प्रसाद का काव्य इतिहास, दर्शन, राष्ट्रवाद और मानवीय संवेदनाओं का समन्वय है।
इन मतों से स्पष्ट है कि ‘लहर’ केवल गीत-संग्रह नहीं, बल्कि चिंतन और संवेदना का समन्वित दस्तावेज़ है।
‘लहर’ की विशेषताएँ (संक्षेप में)
- छायावाद का प्रौढ़ स्वरूप
- निजी प्रेम से लोक-चेतना की ओर विकास
- ऐतिहासिक और सांस्कृतिक चेतना
- दार्शनिक गाम्भीर्य
- परिष्कृत भाषा और संगीतात्मक शिल्प
- प्रतीकात्मकता और बिंब-सौंदर्य
उपसंहार
‘लहर’ जयशंकर प्रसाद की काव्य-यात्रा का वह महत्वपूर्ण पड़ाव है जहाँ भावुकता परिपक्व चिंतन में रूपांतरित होती है।
यह संग्रह सिद्ध करता है कि छायावाद केवल कोमल भावनाओं का आंदोलन नहीं था, बल्कि वह जीवन-दर्शन, राष्ट्रप्रेम और सांस्कृतिक चेतना का भी संवाहक था।
‘लहर’ में कवि का ‘मैं’ धीरे-धीरे ‘हम’ में बदल जाता है। निजी व्यथा विश्व-वेदना में विलीन हो जाती है। प्रकृति राष्ट्र-चेतना का प्रतीक बन जाती है। और प्रेम मानवता के व्यापक आलोक में परिवर्तित हो जाता है।
इस प्रकार ‘लहर’ हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर है। यह कृति प्रसाद जी के प्रौढ़ काव्य-दर्शन का प्रमाण है और छायावादी काव्य की उत्कृष्ट उपलब्धि के रूप में सदैव स्मरणीय रहेगी।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
‘लहर’ का प्रकाशन कब और कहाँ हुआ?
‘लहर’ का प्रकाशन सन् 1935 ई॰ में भारती भंडार, इलाहाबाद से हुआ। यह जयशंकर प्रसाद जी के प्रौढ़ रचनाकाल की प्रतिनिधि कृति मानी जाती है।
‘लहर’ किस साहित्यिक आंदोलन से संबंधित काव्य-संग्रह है?
‘लहर’ छायावाद युग का प्रमुख काव्य-संग्रह है। इसमें छायावाद की मूल विशेषताएँ—प्रकृति-चित्रण, प्रेम, रहस्यात्मकता, आत्मानुभूति और दार्शनिकता—स्पष्ट रूप से मिलती हैं।
‘लहर’ में कुल कितनी कविताएँ संकलित हैं?
‘लहर’ में कुल 33 कविताएँ संकलित हैं, जिन्हें प्रेम-प्रगीत, जागरण गीत, प्रकृति-दार्शनिक गीत तथा ऐतिहासिक-राष्ट्रीय चेतना की कविताओं में वर्गीकृत किया जा सकता है।
‘लहर’ की प्रमुख कविताएँ कौन-कौन सी हैं?
‘बीती विभावरी जाग री’, ‘अशोक की चिन्ता’, ‘शेरसिंह का शस्त्र समर्पण’, ‘पेशोला की प्रतिध्वनि’, ‘प्रलय की छाया’, ‘अरी वरुणा की शान्त कछार’, ‘उठ-उठ री लघु-लघु लोल लहर’ आदि इसकी प्रमुख रचनाएँ हैं।
‘लहर’ की भाषा-शैली की क्या विशेषताएँ हैं?
इसकी भाषा संस्कृतनिष्ठ, तत्सम प्रधान, परिष्कृत तथा अत्यंत संगीतात्मक है। प्रतीकात्मकता, बिंब-विधान और लयात्मकता इसकी शैलीगत विशेषताएँ हैं।
‘लहर’ का साहित्यिक महत्व क्या है?
यह संग्रह छायावाद के प्रौढ़ स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता है। इसमें व्यक्तिगत भावनाएँ लोक-चेतना और दार्शनिक गाम्भीर्य से जुड़ती हैं, जिससे हिंदी प्रगीत-काव्य को नई ऊँचाई मिली।
महत्वपूर्ण दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (विस्तृत प्रश्नोत्तर FAQs)
‘लहर’ को छायावाद का प्रौढ़ काव्य-संग्रह क्यों कहा जाता है?
‘लहर’ छायावाद के उस चरण का प्रतिनिधित्व करती है, जहाँ भावुकता परिपक्व जीवन-दर्शन में रूपांतरित हो जाती है। प्रारम्भिक छायावादी काव्य में जहाँ व्यक्तिगत प्रेम और प्रकृति-सौंदर्य की कोमलता अधिक थी, वहीं ‘लहर’ में यह संवेदना व्यापक सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना से जुड़ जाती है।
इस संग्रह में प्रेम, प्रकृति और रहस्यात्मकता के साथ-साथ ऐतिहासिक दृष्टि, सांस्कृतिक चेतना और दार्शनिक चिंतन का समन्वय मिलता है। ‘अशोक की चिन्ता’ और ‘शेरसिंह का शस्त्र समर्पण’ जैसी कविताएँ इतिहास के माध्यम से वर्तमान को दिशा देती हैं, जबकि ‘बीती विभावरी जाग री’ राष्ट्रीय जागरण का प्रतीक बन जाती है।
अतः विषय-विस्तार, चिंतन-गाम्भीर्य और शिल्प-सौष्ठव के कारण ‘लहर’ को छायावाद का प्रौढ़ काव्य-संग्रह कहा जाता है।
‘लहर’ के भाव-पक्ष पर विस्तार से प्रकाश डालिए।
‘लहर’ का भाव-पक्ष अत्यंत समृद्ध और विविधतापूर्ण है। इसमें निम्न प्रमुख भाव मिलते हैं—
प्रेम और आत्मपरकता: कवि की निजी अनुभूतियाँ कोमल एवं मार्मिक रूप में व्यक्त हुई हैं।
प्रकृति-सौंदर्य: प्रकृति का चित्रण केवल दृश्य नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक है।
राष्ट्रप्रेम: कई कविताएँ राष्ट्रीय चेतना को जाग्रत करती हैं।
ऐतिहासिक चेतना: अतीत की घटनाओं के माध्यम से आत्ममंथन।
दार्शनिकता: जीवन की नश्वरता, परिवर्तन और विश्व-वेदना पर गंभीर चिंतन।
इस प्रकार ‘लहर’ का भाव-पक्ष व्यक्तिगत से सार्वभौमिक की ओर विकसित होता है।
‘लहर’ की शिल्पगत विशेषताओं का विवेचन कीजिए।
‘लहर’ की शिल्पगत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—
प्रगीतात्मकता: प्रत्येक कविता लयात्मक और संक्षिप्त है।
संगीतात्मकता: छंद और अनुप्रास का सुंदर प्रयोग।
प्रतीक एवं बिंब: प्रकृति-चित्रण के माध्यम से गहन भाव व्यक्त।
संस्कृतनिष्ठ भाषा: तत्सम शब्दों का प्रयोग काव्य को गरिमा प्रदान करता है।
इन विशेषताओं के कारण ‘लहर’ हिंदी प्रगीत-काव्य की उत्कृष्ट कृति बन जाती है।
‘लहर’ में ऐतिहासिक और राष्ट्रीय चेतना पर प्रकाश डालिए।
‘लहर’ की कई कविताएँ इतिहास और राष्ट्रीय चेतना से ओत-प्रोत हैं। ‘अशोक की चिन्ता’ में सम्राट अशोक के आत्ममंथन के माध्यम से शांति और मानवता का संदेश दिया गया है। ‘शेरसिंह का शस्त्र समर्पण’ त्याग और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है। ‘पेशोला की प्रतिध्वनि’ स्वतंत्रता-संग्राम की स्मृति को जीवंत करती है।
इन कविताओं में इतिहास केवल वर्णन नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए प्रेरणा और आत्मजागरण का साधन बन जाता है।
‘लहर’ को ‘कामायनी’ की पूर्वपीठिका क्यों माना जाता है?
‘लहर’ में जो दार्शनिक चिंतन, मानव-जीवन की व्यापक दृष्टि और आत्मानुभूति का विस्तार दिखाई देता है, वही आगे चलकर ‘कामायनी’ में पूर्ण विकसित रूप में मिलता है।
यहाँ कवि का ‘स्व’ धीरे-धीरे ‘लोक’ में विलीन होता है। प्रेम और प्रकृति की अनुभूति दार्शनिक व्याख्या का रूप लेती है। इस दृष्टि से ‘लहर’ को ‘कामायनी’ की भावभूमि अथवा पूर्वपीठिका कहा जा सकता है।
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