BNHS और झारखंड वन विभाग की पहल: पारिस्थितिक संतुलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम
गिद्ध भारतीय पारिस्थितिकी तंत्र के ऐसे मूक प्रहरी हैं, जिनकी उपस्थिति प्रकृति की स्वच्छता और स्वास्थ्य दोनों की गारंटी मानी जाती है। इन्हें प्रायः “प्रकृति का सफाईकर्मी” कहा जाता है, क्योंकि ये मृत पशुओं के शवों को खाकर पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखते हैं और घातक संक्रामक रोगों के प्रसार को रोकते हैं। दुर्भाग्यवश, बीते कुछ दशकों में भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया में गिद्धों की आबादी में अभूतपूर्व गिरावट दर्ज की गई है।
इसी गंभीर संकट को देखते हुए हाल ही में बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) और झारखंड वन विभाग के बीच गिद्धों की लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण हेतु एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए हैं। यह पहल न केवल झारखंड बल्कि सम्पूर्ण भारत में गिद्ध संरक्षण प्रयासों को नई दिशा देने वाली मानी जा रही है।
BNHS और झारखंड सरकार के बीच समझौता ज्ञापन (MoU)
समझौते की अवधि
BNHS और झारखंड सरकार के बीच यह समझौता 5 वर्षों के लिए किया गया है। इस अवधि के दौरान वैज्ञानिक अनुसंधान, संरक्षण उपायों, समुदाय सहभागिता और नीति-स्तरीय सहयोग पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
मुख्य उद्देश्य
इस MoU का प्रमुख उद्देश्य झारखंड में पाई जाने वाली गिद्धों की गंभीर रूप से लुप्तप्राय प्रजातियों की सुरक्षा, उनके प्राकृतिक आवास का संरक्षण और उनकी घटती जनसंख्या को पुनर्जीवित करना है।
हजारीबाग जिला: गिद्ध संरक्षण का केंद्र
हजारीबाग का चयन क्यों?
झारखंड के हजारीबाग जिले को इस परियोजना का मुख्य केंद्र बनाया गया है। यह क्षेत्र गिद्धों के लिए इसलिए उपयुक्त माना जाता है क्योंकि—
- यहाँ चट्टानी पहाड़ियाँ और घने वन क्षेत्र उपलब्ध हैं
- गिद्धों के प्राकृतिक प्रजनन स्थल (Breeding Sites) मौजूद हैं
- मानव हस्तक्षेप अपेक्षाकृत कम है
- पारंपरिक पशुपालन अभी भी प्रचलन में है
इन सभी कारणों से हजारीबाग को गिद्धों के संरक्षण और प्रजनन के लिए एक आदर्श क्षेत्र माना गया है।
Vulture Safe Zone (VSZ): गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र
VSZ की अवधारणा
इस परियोजना के अंतर्गत हजारीबाग और उसके आसपास 100 किलोमीटर के दायरे को ‘गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र’ (Vulture Safe Zone – VSZ) के रूप में विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है।
VSZ के प्रमुख लक्ष्य
- डाइक्लोफेनाक और अन्य विषाक्त पशु-औषधियों का पूर्ण उन्मूलन
- गिद्धों के लिए सुरक्षित भोजन की उपलब्धता
- प्राकृतिक आवास का संरक्षण
- स्थानीय प्रशासन और समुदाय की सक्रिय भागीदारी
VSZ मॉडल पहले हरियाणा, राजस्थान और मध्य प्रदेश में सफलतापूर्वक लागू किया जा चुका है।
निगरानी और तकनीकी उपाय
सैटेलाइट टेलीमेट्री और GPS टैगिंग
गिद्धों की गतिविधियों, प्रवास मार्ग, भोजन क्षेत्र और मृत्यु दर पर सटीक जानकारी प्राप्त करने के लिए—
- सैटेलाइट टेलीमेट्री
- GPS टैगिंग
का उपयोग किया जाएगा। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि गिद्ध किन क्षेत्रों में अधिक खतरे में हैं और संरक्षण प्रयासों को किस दिशा में केंद्रित किया जाए।
जन जागरूकता और सामुदायिक सहभागिता
स्थानीय समुदायों की भूमिका
गिद्ध संरक्षण तब तक सफल नहीं हो सकता, जब तक स्थानीय लोग इसमें भागीदार न बनें। इसीलिए—
- पशुपालकों को डाइक्लोफेनाक के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक किया जाएगा
- सुरक्षित विकल्प जैसे मेलॉक्सिकैम के उपयोग को बढ़ावा दिया जाएगा
- स्कूलों और ग्राम सभाओं में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे
भारतीय गिद्ध (Indian Vulture – Gyps indicus)
वैज्ञानिक परिचय
- वैज्ञानिक नाम: Gyps indicus
- सामान्य नाम: लॉन्ग-बिल्ड वल्चर (लंबी चोंच वाला गिद्ध)
शारीरिक विशेषताएँ
- मध्यम आकार का शिकारी पक्षी
- सिर और गर्दन पर पंख नहीं (गंजा सिर)
- लंबी, मजबूत और मुड़ी हुई चोंच
- चौड़े पंख, जो इसे ऊँचाई पर उड़ने में सहायक बनाते हैं
आवास और प्रजनन
यह प्रजाति मुख्यतः—
- पहाड़ी चट्टानों
- दुर्गम और शांत क्षेत्रों
में घोंसला बनाकर प्रजनन करती है।
झारखंड में पाई जाने वाली गिद्धों की प्रमुख प्रजातियाँ
झारखंड में मुख्य रूप से तीन प्रजातियाँ पाई जाती हैं—
- ओरिएंटल व्हाइट-बैक्ड वल्चर (Gyps bengalensis)
- लॉन्ग-बिल्ड वल्चर (Gyps indicus)
- स्लेंडर-बिल्ड वल्चर (Gyps tenuirostris)
IUCN स्थिति
ये तीनों प्रजातियाँ IUCN Red List में Critically Endangered (गंभीर रूप से लुप्तप्राय) श्रेणी में सूचीबद्ध हैं।
गिद्धों का पारिस्थितिक महत्व
प्रकृति के सफाईकर्मी
गिद्ध मृत पशुओं के शवों को तेजी से नष्ट कर—
- पर्यावरण को स्वच्छ रखते हैं
- रोगजनक बैक्टीरिया के प्रसार को रोकते हैं
रोग नियंत्रण में भूमिका
गिद्धों की उपस्थिति से—
- एंथ्रैक्स
- रेबीज
- प्लेग
जैसी बीमारियों का खतरा कम हो जाता है।
आवारा कुत्तों की आबादी पर नियंत्रण
गिद्धों की अनुपस्थिति में मृत पशुओं का मांस—
- आवारा कुत्ते खाते हैं
- जिससे उनकी आबादी बढ़ती है
- और जूनोटिक रोगों का खतरा बढ़ जाता है
गिद्ध संकट के मुख्य कारण
1. डाइक्लोफेनाक (Diclofenac)
- पशुओं को दिया जाने वाला दर्द निवारक (NSAID)
- गिद्धों के लिए अत्यंत घातक
- किडनी फेल होने से गिद्धों की मृत्यु
भारत सरकार ने 2006 में इस पर प्रतिबंध लगाया, लेकिन—
- अवैध उपयोग आज भी जारी है
2. आवास का विनाश
- शहरीकरण
- औद्योगीकरण
- पेड़ों की कटाई
से गिद्धों के घोंसले नष्ट हो रहे हैं।
3. भोजन की कमी
- आधुनिक शव निपटान प्रणालियाँ
- खुले में शवों की उपलब्धता में कमी
संरक्षण हेतु सरकारी पहल
गिद्ध संरक्षण कार्य योजना (2020–25)
भारत सरकार की यह कार्य योजना निम्नलिखित बिंदुओं पर केंद्रित है—
- विषाक्त दवाओं का कठोर विनियमन
- देशभर में 8 नए संरक्षण प्रजनन केंद्र
- Vulture Safe Zones का विस्तार
- अनुसंधान और निगरानी तंत्र को सुदृढ़ करना
गिद्ध संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र
भारत में वर्तमान में निम्नलिखित केंद्र कार्यरत हैं—
- पिंजौर (हरियाणा)
- भोपाल (मध्य प्रदेश)
- गुवाहाटी (असम)
- हैदराबाद (तेलंगाना)
इन्हें सामूहिक रूप से ‘जटायु संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र (JCBC)’ कहा जाता है।
गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र (VSZ): दीर्घकालिक समाधान
VSZ मॉडल—
- स्थानीय प्रशासन
- पशु चिकित्सा विभाग
- समुदाय
के सहयोग से लागू किया जाता है, जहाँ 100 किमी के दायरे में डाइक्लोफेनाक का उपयोग शून्य सुनिश्चित किया जाता है।
निष्कर्ष
BNHS और झारखंड वन विभाग के बीच हुआ यह समझौता गिद्ध संरक्षण की दिशा में एक मील का पत्थर है। हजारीबाग को केंद्र बनाकर विकसित किया जा रहा Vulture Safe Zone, तकनीकी निगरानी, जन जागरूकता और सरकारी योजनाओं के समन्वय से न केवल झारखंड बल्कि पूरे भारत में गिद्धों की घटती आबादी को पुनर्जीवित करने की उम्मीद जगाता है।
यदि समय रहते गिद्धों का संरक्षण नहीं किया गया, तो इसका प्रभाव केवल जैव विविधता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मानव स्वास्थ्य और पारिस्थितिक संतुलन भी गंभीर रूप से प्रभावित होगा। अतः यह पहल प्रकृति, मानव और भविष्य—तीनों के लिए अत्यंत आवश्यक है।
इन्हें भी देखें –
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