23 फरवरी 2026 को भारत की राजधानी नई दिल्ली स्थित भव्य राष्ट्रपति भवन एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण आयोजन का साक्षी बना, जब देश के पहले भारतीय गवर्नर-जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (राजाजी) के जीवन, विचारों और विरासत को समर्पित ‘राजाजी उत्सव’ का औपचारिक शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र (Presidential Cultural Centre) में आयोजित कार्यक्रम में भाग लिया और राजाजी की प्रतिमा का अनावरण किया। यह आयोजन न केवल एक महान स्वतंत्रता सेनानी और राष्ट्रनिर्माता को श्रद्धांजलि देने का अवसर था, बल्कि भारत की उत्तर-औपनिवेशिक सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय आत्मगौरव को पुनर्स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक कदम भी माना जा रहा है।
यह उत्सव भारत के इतिहास, स्वतंत्रता संग्राम और लोकतांत्रिक परंपरा में राजाजी के अद्वितीय योगदान को जन-जन तक पहुंचाने का एक व्यापक सांस्कृतिक अभियान है। राष्ट्रपति भवन परिसर में स्थापित यह नई प्रतिमा केवल एक स्मारक नहीं, बल्कि भारत की ऐतिहासिक स्मृति, सांस्कृतिक आत्मसम्मान और स्वतंत्र विचारधारा का जीवंत प्रतीक है।
राजाजी उत्सव का उद्देश्य और ऐतिहासिक महत्व
‘राजाजी उत्सव’ का आयोजन राष्ट्रपति भवन में इसलिए विशेष महत्व रखता है क्योंकि यह स्थान भारतीय गणतंत्र की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था का केंद्र है। ऐसे प्रतिष्ठित स्थल पर भारत के पहले और एकमात्र भारतीय गवर्नर-जनरल की प्रतिमा का स्थापित होना भारतीय इतिहास के पुनर्स्मरण और पुनर्स्थापन की दिशा में एक गहन सांस्कृतिक संकेत है।
इस उत्सव का प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
- चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के जीवन और विचारों का प्रचार-प्रसार
- भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को उजागर करना
- लोकतांत्रिक परंपराओं और राष्ट्रनिर्माण में उनकी भूमिका का सम्मान
- नई पीढ़ी को भारत के महान नेताओं से परिचित कराना
- औपनिवेशिक प्रतीकों के स्थान पर भारतीय विरासत को प्रमुखता देना
यह आयोजन केवल एक स्मृति कार्यक्रम नहीं, बल्कि राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना के पुनरुत्थान का प्रयास है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की उपस्थिति और प्रतिमा अनावरण
कार्यक्रम में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की उपस्थिति ने इस आयोजन की गरिमा को और बढ़ा दिया। उन्होंने राष्ट्रपति भवन कल्चरल सेंटर में आयोजित इस समारोह में भाग लेते हुए चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की प्रतिमा का अनावरण किया। यह प्रतिमा राष्ट्रपति भवन के अशोक मंडप के पास स्थित भव्य सीढ़ियों पर स्थापित की गई है, जहां पहले ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस की प्रतिमा लगी हुई थी।
राष्ट्रपति ने अपने संदेश में कहा कि यह परिवर्तन केवल प्रतिमा बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक आत्मपहचान को पुनर्स्थापित करने की दिशा में एक सशक्त कदम है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत अब गुलामी की मानसिकता से मुक्त होकर अपनी विरासत, परंपरा और राष्ट्रीय गौरव को गर्व के साथ स्वीकार कर रहा है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर अपने संदेश में राष्ट्रपति ने इस निर्णय को सांस्कृतिक आत्मसम्मान और ऐतिहासिक संतुलन की दिशा में महत्वपूर्ण बताया।
एडविन लुटियंस की प्रतिमा क्यों बदली गई?
राष्ट्रपति भवन परिसर में ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस की प्रतिमा का स्थान बदलकर राजाजी की प्रतिमा स्थापित करने का निर्णय व्यापक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से लिया गया है। यह निर्णय औपनिवेशिक प्रतीकों से भारतीय पहचान की ओर संक्रमण का प्रतीक माना जा रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अनुसार, स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी अनेक प्रमुख सरकारी परिसरों में ब्रिटिश अधिकारियों की प्रतिमाएं और औपनिवेशिक प्रतीक बने रहे, जबकि भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों और राष्ट्रनिर्माताओं को पर्याप्त स्थान और सम्मान नहीं मिल सका। ऐसे में इस निर्णय को ऐतिहासिक संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक आवश्यक कदम बताया गया है।
इस निर्णय के प्रमुख कारण
1. औपनिवेशिक प्रतीकों को हटाने का प्रयास
भारत की आजादी के 75 से अधिक वर्षों बाद भी कई महत्वपूर्ण राष्ट्रीय स्थलों पर औपनिवेशिक प्रतीकों की उपस्थिति भारत की ऐतिहासिक स्मृति के संदर्भ में प्रश्न उठाती रही है। इस कदम के माध्यम से उन प्रतीकों को पुनर्समीक्षित करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया है।
2. राष्ट्रनिर्माताओं को उचित सम्मान
चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जैसे महान स्वतंत्रता सेनानी, विचारक और प्रशासक को राष्ट्रपति भवन जैसे प्रतिष्ठित स्थल पर स्थान देना उनके योगदान को औपचारिक राष्ट्रीय मान्यता प्रदान करना है।
3. ‘पंच-प्राण’ दृष्टि के अनुरूप
सरकार द्वारा प्रस्तुत ‘पंच-प्राण’ संकल्पों में से एक प्रमुख लक्ष्य गुलामी की मानसिकता से मुक्ति है। इस निर्णय को उसी दृष्टि के अंतर्गत एक सांस्कृतिक पुनर्संरचना के रूप में देखा जा रहा है।
4. राष्ट्रीय पहचान का सुदृढ़ीकरण
ऐतिहासिक स्थलों के भारतीयकरण के माध्यम से भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान को और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
एडविन लुटियंस: एक ऐतिहासिक परिचय
एडविन लुटियंस एक प्रसिद्ध ब्रिटिश वास्तुकार थे, जिन्हें वर्ष 1912 में ब्रिटिश भारत की नई राजधानी दिल्ली के निर्माण का दायित्व सौंपा गया था। उन्होंने नई दिल्ली के वास्तुशिल्पीय स्वरूप को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
लुटियंस द्वारा डिज़ाइन किए गए प्रमुख स्थल
- राष्ट्रपति भवन
- नॉर्थ ब्लॉक
- साउथ ब्लॉक
- इंडिया गेट
- हैदराबाद हाउस
- कॉनॉट प्लेस
नई दिल्ली का केंद्रीय प्रशासनिक क्षेत्र आज भी “लुटियंस दिल्ली” के नाम से जाना जाता है, जो ब्रिटिश वास्तुकला और औपनिवेशिक शहरी नियोजन का प्रमुख उदाहरण है। हालांकि, स्वतंत्र भारत में इन संरचनाओं का उपयोग भारतीय लोकतांत्रिक संस्थाओं द्वारा किया जा रहा है, जिससे उनका अर्थ और प्रतीकात्मकता समय के साथ परिवर्तित हो गई है।
सी. राजगोपालाचारी (राजाजी): एक बहुआयामी व्यक्तित्व
चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, जिन्हें स्नेहपूर्वक ‘राजाजी’ कहा जाता है, भारत के इतिहास के उन महान व्यक्तित्वों में से एक थे जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम, प्रशासन, राजनीति, साहित्य और सामाजिक चिंतन के क्षेत्र में अमूल्य योगदान दिया।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
राजाजी का जन्म 10 दिसंबर 1878 को तमिलनाडु में हुआ था। वे एक मेधावी छात्र थे और आगे चलकर एक सफल वकील बने। उनकी बौद्धिक क्षमता, तार्किक सोच और नैतिक दृढ़ता ने उन्हें शीघ्र ही सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठित बना दिया।
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान
राजाजी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रणी नेताओं में से थे और महात्मा गांधी के निकट सहयोगी थे। उन्होंने असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह और अन्य जनआंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई।
उनका राजनीतिक दृष्टिकोण संतुलित, व्यावहारिक और नैतिक मूल्यों पर आधारित था। वे हिंसा के विरोधी और संवैधानिक लोकतंत्र के समर्थक थे।
महात्मा गांधी के निकट सहयोगी
राजाजी का संबंध महात्मा गांधी से अत्यंत घनिष्ठ था। गांधीजी ने उन्हें अपने सबसे विश्वसनीय सहयोगियों में से एक माना। गांधीजी की जेल अवधि के दौरान राजाजी ने ‘Young India’ पत्रिका का संपादन किया और स्वतंत्रता आंदोलन की वैचारिक दिशा को आगे बढ़ाया।
उनकी वैचारिक स्पष्टता और अनुशासन ने उन्हें गांधीवादी राजनीति का एक प्रमुख स्तंभ बना दिया।
भारत के एकमात्र और अंतिम गवर्नर-जनरल
राजाजी का सबसे ऐतिहासिक योगदान यह था कि वे भारत के पहले और एकमात्र भारतीय गवर्नर-जनरल बने। उन्होंने 1948 से 1950 तक इस पद पर कार्य किया, जब भारत औपनिवेशिक शासन से पूर्ण गणतांत्रिक व्यवस्था की ओर संक्रमण के दौर से गुजर रहा था।
यह पद पहले ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा संभाला जाता था, इसलिए एक भारतीय का इस पद पर आसीन होना स्वतंत्र भारत की संप्रभुता और आत्मनिर्भरता का प्रतीक था।
स्वतंत्र भारत की राजनीति में भूमिका
स्वतंत्रता के बाद भी राजाजी ने भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने प्रशासनिक सुधारों, आर्थिक स्वतंत्रता और नैतिक राजनीति की वकालत की।
वे पंडित जवाहरलाल नेहरू की कैबिनेट में गृह मंत्री भी रहे और देश की आंतरिक प्रशासनिक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में योगदान दिया।
स्वतंत्र पार्टी की स्थापना
वर्ष 1957 में राजाजी ने ‘स्वतंत्र पार्टी’ की स्थापना की, जो उस समय की समाजवादी नीतियों के विकल्प के रूप में उभरी। यह पार्टी व्यक्तिगत स्वतंत्रता, आर्थिक उदारीकरण और न्यूनतम सरकारी हस्तक्षेप की समर्थक थी।
उनके विचारों ने भारतीय लोकतंत्र में वैचारिक विविधता को मजबूत किया।
राजाजी की वैचारिक विरासत
राजाजी अपने स्वतंत्र विचार, नैतिक अनुशासन और सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता के लिए जाने जाते थे। वे केवल एक राजनेता ही नहीं, बल्कि एक गहन विचारक, लेखक और दार्शनिक भी थे।
उनकी प्रमुख विशेषताएं:
- नैतिक राजनीति के समर्थक
- प्रशासनिक कुशलता
- बौद्धिक स्पष्टता
- राष्ट्रीय एकता के पक्षधर
- सांस्कृतिक चेतना के संवाहक
राष्ट्रपति भवन में आयोजित प्रदर्शनी (24 फरवरी – 1 मार्च)
राजाजी उत्सव के अंतर्गत 24 फरवरी से 1 मार्च तक राष्ट्रपति भवन में एक विशेष प्रदर्शनी का आयोजन किया जा रहा है। इस प्रदर्शनी में राजाजी के जीवन, स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका, प्रशासनिक योगदान और वैचारिक दृष्टिकोण को दर्शाया जाएगा।
प्रदर्शनी की मुख्य विशेषताएं:
- दुर्लभ ऐतिहासिक दस्तावेज
- व्यक्तिगत पत्र और अभिलेख
- स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी सामग्री
- डिजिटल अभिलेख और मल्टीमीडिया प्रस्तुति
- राजाजी के भाषणों और लेखों का संकलन
यह प्रदर्शनी विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और इतिहास प्रेमियों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
औपनिवेशिक प्रतीकों से नई पहचान की ओर
राष्ट्रपति भवन में लुटियंस की प्रतिमा के स्थान पर राजाजी की प्रतिमा स्थापित करना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि एक व्यापक सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक परिवर्तन का संकेत है। इसे भारत की उत्तर-औपनिवेशिक परिवर्तन यात्रा के एक महत्वपूर्ण चरण के रूप में देखा जा रहा है।
सरकार ने इस संदर्भ में निम्न बिंदुओं पर विशेष बल दिया है:
1. ऐतिहासिक स्थलों का पुनः भारतीयकरण
भारत के प्रमुख ऐतिहासिक और प्रशासनिक स्थलों को भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और राष्ट्रीय विरासत के अनुरूप पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है।
2. भारतीय नेतृत्व का सम्मान
स्वतंत्रता सेनानियों और राष्ट्रनिर्माताओं को राष्ट्रीय स्मृति में उचित स्थान देना लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए आवश्यक है।
3. सांस्कृतिक आत्मगौरव का पुनर्जागरण
यह कदम भारत की सांस्कृतिक चेतना को पुनर्जीवित करने और राष्ट्रीय आत्मसम्मान को सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
4. नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा
ऐसे प्रतीकात्मक परिवर्तन युवा पीढ़ी को देश के महान नेताओं और उनके आदर्शों से प्रेरित करने का कार्य करते हैं।
कार्यक्रम की मुख्य झलकियां
- राष्ट्रपति भवन में राजाजी की प्रतिमा का अनावरण
- ‘राजाजी उत्सव’ का औपचारिक शुभारंभ (23 फरवरी 2026)
- 24 फरवरी से 1 मार्च तक विशेष प्रदर्शनी
- भारतीय लोकतंत्र में राजाजी के योगदान को श्रद्धांजलि
- सांस्कृतिक कार्यक्रम और ऐतिहासिक व्याख्यान
महत्वपूर्ण तथ्य
- घोषणा: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
- कार्यक्रम: मन की बात
- स्थान: राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली
- नई प्रतिमा: चक्रवर्ती राजगोपालाचारी
- उत्सव प्रारंभ: 23 फरवरी 2026
- प्रदर्शनी अवधि: 24 फरवरी – 1 मार्च
- उपस्थिति: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू
निष्कर्ष: सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीकात्मक अध्याय
राष्ट्रपति भवन में ‘राजाजी उत्सव’ का आयोजन और चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की प्रतिमा का अनावरण भारत के सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और वैचारिक पुनर्जागरण का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। यह कदम केवल एक महान नेता को सम्मान देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की उस ऐतिहासिक यात्रा को भी दर्शाता है जिसमें देश औपनिवेशिक विरासत से आगे बढ़कर अपनी स्वदेशी पहचान को पुनर्स्थापित कर रहा है।
यह परिवर्तन भारत की राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक गौरव और लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ करने की दिशा में एक प्रेरणादायक पहल है। राजाजी जैसे महान व्यक्तित्व को राष्ट्रपति भवन में सम्मानित करना इस बात का प्रतीक है कि भारत अब अपने इतिहास को पुनर्परिभाषित करते हुए उन महान राष्ट्रनिर्माताओं को केंद्र में ला रहा है, जिन्होंने देश की स्वतंत्रता, लोकतंत्र और नैतिक राजनीति की नींव को मजबूत किया।
अंततः, ‘राजाजी उत्सव’ केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय आत्मसम्मान, ऐतिहासिक संतुलन और राष्ट्रीय पुनर्जागरण का सशक्त प्रतीक है, जो आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्रनिर्माण, नैतिक नेतृत्व और सांस्कृतिक गौरव की प्रेरणा देता रहेगा।
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