भारत में तंबाकू सेवन लंबे समय से एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है। धूम्रपान और धुंआरहित तंबाकू—दोनों ही रूपों में इसका व्यापक उपयोग न केवल लाखों लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, बल्कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य तंत्र पर भी भारी बोझ डालता है। विशेष रूप से गुटखा, पान मसाला, खैनी और जर्दा जैसे धुंआरहित तंबाकू उत्पादों का सेवन भारत के कई राज्यों में सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से गहराई से जुड़ा हुआ है। इसी पृष्ठभूमि में ओडिशा सरकार द्वारा पूरे राज्य में गुटखा, पान मसाला तथा सभी तंबाकू/निकोटीन युक्त खाद्य उत्पादों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाना एक ऐतिहासिक और निर्णायक कदम के रूप में देखा जा रहा है।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग द्वारा जारी नवीनतम अधिसूचना के माध्यम से ओडिशा न केवल अपने पूर्ववर्ती आदेशों को अधिक सख्त और स्पष्ट बनाता है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के देशव्यापी निर्देशों का पूर्ण अनुपालन करने वाला राज्य भी बन गया है। यह लेख ओडिशा सरकार के इस निर्णय के कानूनी आधार, पृष्ठभूमि, दायरे, नीतिगत आवश्यकता, आर्थिक प्रभाव और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
प्रतिबंध की पृष्ठभूमि: 2013 से 2026 तक की यात्रा
ओडिशा में तंबाकू नियंत्रण कोई नया विषय नहीं है। राज्य सरकार ने पहली बार वर्ष 2013 में गुटखा और पान मसाला पर प्रतिबंध लगाया था। यह प्रतिबंध मुख्यतः खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 के अंतर्गत जारी किया गया था, जिसके तहत तंबाकू और निकोटीन को खाद्य पदार्थों में मिलाना निषिद्ध है।
हालाँकि, समय के साथ यह स्पष्ट हुआ कि उद्योग जगत ने कानून की खामियों का लाभ उठाते हुए नए तरीके अपनाए—
- गुटखा को अलग-अलग घटकों में बेचकर
- पान मसाला और सुगंधित तंबाकू को अलग पैकेट में उपलब्ध कराकर
- उपभोक्ताओं को स्वयं मिलाकर सेवन करने के लिए प्रेरित करके
इन तरीकों से प्रतिबंध को व्यवहार में कमजोर कर दिया गया। इसी कारण 2013 का आदेश प्रभावी होने के बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाया।
22 जनवरी 2026 की नई अधिसूचना: कानूनी मजबूती का प्रतीक
इन सभी कमियों को दूर करने के लिए ओडिशा सरकार ने 22 जनवरी 2026 को एक नई और संशोधित अधिसूचना जारी की। यह अधिसूचना खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 की धारा 2.3.4 के अंतर्गत जारी की गई है, जो तंबाकू और निकोटीन युक्त किसी भी खाद्य उत्पाद के निर्माण और बिक्री पर रोक लगाती है।
इस अधिसूचना की प्रमुख विशेषता यह है कि—
- अब केवल “गुटखा” ही नहीं, बल्कि
- किसी भी नाम, रूप, पैकेजिंग या संयोजन में बिकने वाले
- तंबाकू या निकोटीन युक्त सभी चबाने योग्य उत्पाद
पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिए गए हैं।
स्वास्थ्य सचिव अस्वथी एस. के अनुसार, यह कदम सुप्रीम कोर्ट के उन निर्देशों के अनुरूप है जिनमें राज्यों को गुटखा और पान मसाला पर पूर्ण और प्रभावी प्रतिबंध सुनिश्चित करने को कहा गया था।
प्रतिबंध का व्यापक दायरा: ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति
1. प्रतिबंधित उत्पाद
नई अधिसूचना के तहत प्रतिबंध का दायरा अत्यंत व्यापक रखा गया है। इसमें शामिल हैं—
- गुटखा
- पान मसाला
- खैनी
- जर्दा
- सुगंधित या फ्लेवर्ड तंबाकू
- निकोटीन युक्त कोई भी खाद्य उत्पाद
चाहे ये उत्पाद पैकेज्ड हों या अनपैकेज्ड, ब्रांडेड हों या स्थानीय—सभी पर समान रूप से प्रतिबंध लागू होगा।
2. प्रतिबंधित गतिविधियाँ
यह प्रतिबंध केवल बिक्री तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी आपूर्ति श्रृंखला को कवर करता है—
- निर्माण (Manufacturing)
- प्रसंस्करण (Processing)
- पैकेजिंग
- भंडारण
- परिवहन
- वितरण
- खुदरा बिक्री
अर्थात, किसी भी स्तर पर इन उत्पादों से जुड़ी गतिविधि अवैध मानी जाएगी।
3. अलग-अलग बेचकर मिलाने वाले उत्पाद भी शामिल
यह नई अधिसूचना का सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक पहलू है। अब—
- पान मसाला और तंबाकू को अलग-अलग बेचकर
- उपभोक्ता द्वारा बाद में मिलाने की रणनीति
भी कानून के दायरे में अपराध मानी जाएगी। इससे उद्योग द्वारा अपनाए गए ‘कानूनी चकमा’ (Legal Loopholes) पूरी तरह बंद हो गए हैं।
अपवाद और सीमाएँ
इस अधिसूचना के अंतर्गत—
- बीड़ी और सिगरेट को खाद्य सुरक्षा अधिनियम की इस विशिष्ट श्रेणी के प्रतिबंध से बाहर रखा गया है।
हालाँकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि वे पूरी तरह मुक्त हैं। बीड़ी और सिगरेट पर—
- COTPA, 2003
- सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान निषेध
- विज्ञापन प्रतिबंध
- चेतावनी लेबल
जैसे अन्य कानून पहले से लागू हैं।
नीतिगत आवश्यकता: ओडिशा में तंबाकू की गंभीर स्थिति
1. उच्च उपभोग दर
‘ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वे (GATS-2)’ के अनुसार—
- ओडिशा में 42% से अधिक वयस्क धुंआरहित तंबाकू का सेवन करते हैं।
- यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत से लगभग दोगुना है।
यह स्थिति राज्य को तंबाकू जनित रोगों के लिए अत्यधिक संवेदनशील बनाती है।
2. कैंसर का बढ़ता बोझ
ओडिशा में—
- ओरल कैंसर
- गले का कैंसर
- फेफड़ों और पाचन तंत्र से जुड़े कैंसर
के मामलों में तंबाकू सेवन सबसे बड़ा जोखिम कारक है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, इनमें से अधिकांश मामलों को रोकथाम योग्य (Preventable) माना जाता है।
3. युवाओं पर दुष्प्रभाव
15–17 वर्ष के किशोरों में—
- खैनी और पान मसाला की आसान उपलब्धता
- कम कीमत
- सामाजिक स्वीकृति
उन्हें तंबाकू की लत की ओर तेजी से धकेल रही है। इस पृष्ठभूमि में राज्य सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति भविष्य की पीढ़ी को सुरक्षित रखने की दिशा में एक अनिवार्य कदम बन जाती है।
प्रवर्तन और दंडात्मक प्रावधान
सरकार ने केवल प्रतिबंध की घोषणा ही नहीं की है, बल्कि कठोर प्रवर्तन व्यवस्था भी सुनिश्चित की है—
- जिला प्रशासन
- खाद्य सुरक्षा अधिकारी
- पुलिस विभाग
को संयुक्त रूप से नियमित छापेमारी करने के निर्देश दिए गए हैं।
दंड प्रावधान:
- भारी आर्थिक जुर्माना
- गंभीर मामलों में 10 वर्ष तक की जेल
- अवैध माल की जब्ती और नष्ट करना
इन प्रावधानों का उद्देश्य कानून का भय पैदा करना नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सुरक्षा को प्राथमिकता देना है।
आर्थिक प्रभाव: राजस्व बनाम जनस्वास्थ्य
इस पूर्ण प्रतिबंध से—
- राज्य को सालाना लगभग ₹1,047 करोड़
(Excise और GST) के राजस्व नुकसान का अनुमान है।
फिर भी सरकार का स्पष्ट रुख है कि—
“जनस्वास्थ्य की कीमत पर राजस्व स्वीकार्य नहीं है।”
दीर्घकाल में—
- स्वास्थ्य व्यय में कमी
- उत्पादकता में वृद्धि
- सामाजिक-आर्थिक लाभ
इस नुकसान की भरपाई कर सकते हैं।
केंद्र सरकार के नए कर नियम और राष्ट्रीय समन्वय
ओडिशा के इस कदम को केंद्र सरकार की नीतियों से भी मजबूती मिल रही है।
1 फरवरी 2026 से—
- पान मसाला, सिगरेट आदि पर 40% GST
- बीड़ी पर 18% GST
- अतिरिक्त उत्पाद शुल्क
- स्वास्थ्य एवं राष्ट्रीय सुरक्षा उपकर (Cess)
लागू किए जाएंगे।
इसके साथ ही—
- गुटखा और जर्दा पैकिंग मशीनों से संबंधित नए नियम
- GST मुआवजा उपकर (Compensation Cess) की समाप्ति
जैसे कदम तंबाकू उद्योग पर दबाव और बढ़ाएंगे।
अन्य राज्यों का अनुभव: ओडिशा अकेला नहीं
भारत के कई राज्यों ने पहले ही इस दिशा में कदम उठाए हैं—
- महाराष्ट्र (2012): शुरुआती राज्यों में शामिल
- बिहार: गुटखा और पान मसाला पर कड़ा प्रतिबंध
- झारखंड: 2025 से पूर्ण प्रतिबंध
- तमिलनाडु (2025): पुनः प्रतिबंध लागू
- राजस्थान: निकोटीन युक्त पान मसाला पर रोक
ओडिशा का निर्णय इन प्रयासों की निरंतरता और परिपक्वता को दर्शाता है।
निष्कर्ष
ओडिशा सरकार द्वारा गुटखा, पान मसाला और सभी तंबाकू/निकोटीन युक्त खाद्य उत्पादों पर लगाया गया पूर्ण प्रतिबंध केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का स्पष्ट राजनीतिक और नैतिक वक्तव्य है। यह निर्णय अल्पकालिक राजस्व नुकसान के बावजूद दीर्घकालिक सामाजिक लाभों को ध्यान में रखकर लिया गया है।
यदि इस प्रतिबंध का प्रभावी और ईमानदार क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाता है, तो ओडिशा आने वाले वर्षों में—
- तंबाकू सेवन में उल्लेखनीय कमी
- कैंसर और अन्य रोगों के मामलों में गिरावट
- और एक स्वस्थ समाज की ओर अग्रसर
हो सकता है। यह पहल अन्य राज्यों के लिए भी एक प्रेरक मॉडल बन सकती है।
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