‘बीती विभावरी’ हिंदी काव्य की उन मधुर, संगीतात्मक और भावप्रवण रचनाओं में से एक है, जो पाठक के हृदय में नवचेतना का संचार कर देती हैं। यह गीत महान छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद की अमर कृति है, जो उनके काव्य-संग्रह “लहर” में संकलित है। यह केवल एक प्रकृति-चित्रण मात्र नहीं, बल्कि एक सशक्त जागरण-गीत है—ऐसा जागरण जो बाह्य जगत के साथ-साथ अंतरात्मा के स्तर पर भी घटित होता है।
इस गीत में कवि ने प्रभातकालीन प्रकृति का अत्यंत कोमल, मधुर और कलात्मक चित्र प्रस्तुत करते हुए एक सखी के माध्यम से नायिका को जगाने का प्रयास किया है। यह जागरण केवल निद्रा से उठने का आह्वान नहीं, बल्कि नवजीवन, नवचेतना और नवसृजन का निमंत्रण है।
संभावित परीक्षा-प्रश्न:
1. ‘बीती विभावरी’ नामक गीत का मूल भाव अपने शब्दों में व्यक्त कीजिए।
2. ‘बीती विभावरी’ नामक गीत के काव्य-सौष्ठव पर प्रकाश डालिए।
3. जयशंकर प्रसाद के ‘बीती विभावरी’ गीत में प्रकृति-चित्रण की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
4. ‘बीती विभावरी’ को एक जागरण-गीत सिद्ध कीजिए।
5. ‘बीती विभावरी’ गीत में प्रयुक्त अलंकारों का उदाहरण सहित विवेचन कीजिए।
6. ‘बीती विभावरी’ में निहित प्रतीकात्मकता एवं छायावादी विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
7. ‘बीती विभावरी’ गीत में निहित नवचेतना और जागरण-संदेश की व्याख्या कीजिए।
8. ‘बीती विभावरी’ गीत की भाषा-शैली एवं रस-विधान पर प्रकाश डालिए।
‘बीती विभावरी’ : गीत का प्रसंग और स्वरूप
‘बीती विभावरी’ छायावादी काव्यधारा के प्रमुख कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित एक अत्यंत मधुर एवं प्रभावपूर्ण जागरण-गीत है, जो उनके काव्य-संग्रह लहर में संकलित है। इस गीत में कवि ने रात्रि के अवसान और प्रभात के आगमन का अत्यंत मनोहारी चित्र उपस्थित किया है। रात्रि बीत चुकी है; आकाश के तारे एक-एक कर लुप्त हो रहे हैं। शीतल, मंद और सुगंधित पवन बह रही है। वातावरण में नवप्रभात की ताजगी और कोमलता व्याप्त है। वृक्षों की डालियों पर कलियाँ चटकने लगी हैं और संपूर्ण प्रकृति जागृत होकर नवीन जीवन का स्वागत कर रही है।
किन्तु इस समूचे जाग्रत परिवेश के बीच नायिका अभी भी निद्रा में लीन है। उसकी सखी उसे संबोधित कर स्नेहपूर्वक जगाती है और कहती है—अब जागो और इस मधुर प्रभातकालीन सौंदर्य का रसास्वादन करो। वह संकेत करती है कि देखो, आकाश रूपी पनघट में उषा रूपी नागरी तारों रूपी घटों को डुबो रही है; अर्थात् उषाकाल हो चुका है और रात्रि के चिह्न विलीन हो रहे हैं। अतः अब आलस्य और निद्रा का त्याग कर इस नवप्रभात का स्वागत करना ही उचित है।
‘बीती विभावरी’ मूलतः एक प्रभात-गीत है। ‘विभावरी’ का अर्थ है—रात्रि। जब कवि कहते हैं—
“बीती विभावरी जाग री।”
तो यह केवल समय-सूचना नहीं है, बल्कि जीवन के अंधकार के समाप्त होने और प्रकाश के आगमन की प्रतीकात्मक उद्घोषणा है। यह उद्घोष नायिका को संबोधित है, परंतु वस्तुतः यह समस्त मानव-समाज के लिए प्रेरणास्वरूप है।
गीत में रात्रि के बीतने और उषा के आगमन का अत्यंत मोहक चित्र खींचा गया है। आकाश, तारे, पवन, लताएँ, कलियाँ और पक्षी—सभी जाग उठे हैं; केवल नायिका ही निद्रा में लीन है। सखी उसे पुकारकर कहती है कि अब उठो और इस मधुर प्रभात का सौंदर्य निहारो।
मूल भाव : जागरण और नवचेतना का संदेश
इस गीत का मूल भाव जागरण है—बाह्य भी और आंतरिक भी।
रात्रि अज्ञान, जड़ता और निष्क्रियता का प्रतीक है, जबकि उषा ज्ञान, चेतना और सक्रियता का। कवि का संकेत है कि अब अंधकार समाप्त हो चुका है; अब आलस्य त्यागकर जीवन के नवप्रभात का स्वागत करना चाहिए।
गीत की प्रसिद्ध पंक्तियाँ—
अम्बर पनघट में डुबो रही
तारा घट उषा नागरी।
यहाँ ‘अम्बर’ को पनघट, ‘तारों’ को घट (घड़े) और ‘उषा’ को नागरी (स्त्री) के रूप में चित्रित किया गया है। उषा मानो आकाश रूपी पनघट में तारों के घट डुबो रही है। अर्थात् तारे अस्त हो रहे हैं और प्रभात का प्रकाश फैल रहा है।
यह दृश्य अत्यंत सजीव और प्रतीकात्मक है। रात्रि के तारों का लुप्त होना और उषा का आगमन—जीवन में निराशा के स्थान पर आशा के उदय का संकेत है।
प्रकृति-चित्रण की कोमलता
छायावादी कवियों की विशेषता रही है कि उन्होंने प्रकृति को केवल दृश्य वस्तु के रूप में नहीं, बल्कि संवेदनशील, सजीव सत्ता के रूप में प्रस्तुत किया। ‘बीती विभावरी’ में भी प्रकृति का चित्रण अत्यंत कोमल, मधुर और सजीव है।
कवि लिखते हैं—
खग कुल कुल कुल सा बोल रहा,
किसलय का अंचल डोल रहा।
लो यह लतिका भी भर लाई,
मधुमुकुल नवल रस गागरी।।
इन पंक्तियों में प्रकृति के अनेक रूप एक साथ सजीव हो उठते हैं—
- पक्षी मधुर स्वर में कलरव कर रहे हैं।
- किसलयों (कोमल पत्तों) का अंचल शीतल पवन से डोल रहा है।
- लता मानो नव-रस से भरी गागर लेकर खड़ी है।
यह दृश्य अत्यंत मधुर और जीवन्त है। प्रकृति का प्रत्येक तत्व मानो किसी उत्सव में सम्मिलित है। ऐसे वातावरण में निद्रा में लीन रहना अनुचित है—इसी भाव से सखी नायिका को जगाती है।
प्रतीकात्मकता और दार्शनिकता
यह गीत केवल सौंदर्य-वर्णन नहीं है। इसमें गहरी प्रतीकात्मकता निहित है।
- विभावरी (रात्रि) – अज्ञान, मोह, आलस्य
- उषा (प्रभात) – ज्ञान, जागृति, नवचेतना
- तारे – क्षीण होती पुरानी स्थितियाँ
- लतिका और कलियाँ – नवसृजन और विकास
- खग-कलरव – जीवन की सक्रियता
नायिका का सोना मनुष्य की जड़ता का प्रतीक है। सखी का उसे जगाना आत्मचेतना की पुकार है।
इस प्रकार यह गीत व्यक्तिगत स्तर से उठकर सामाजिक और राष्ट्रीय स्तर तक पहुँच जाता है। छायावाद के युग में यह गीत राष्ट्रीय चेतना के जागरण का भी प्रतीक माना जा सकता है।
काव्य-सौष्ठव : अलंकारों का सौंदर्य
‘बीती विभावरी’ का काव्य-सौष्ठव अत्यंत उच्चकोटि का है। इसमें अनेक अलंकारों का सटीक और प्रभावपूर्ण प्रयोग हुआ है।
(क) रूपक अलंकार
अम्बर पनघट में डुबो रही
तारा घट उषा नागरी।
यहाँ आकाश को पनघट, तारे को घट और उषा को नागरी (स्त्री) कहा गया है। यह सांगरूपक का उत्कृष्ट उदाहरण है।
(ख) मानवीकरण
- उषा को नागरी कहा गया है।
- लतिका को गागर भर लाने वाली नायिका के रूप में चित्रित किया गया है।
इन प्रयोगों से प्रकृति में जीवंतता आ जाती है।
(ग) उपमा अलंकार
खग कुल कुल कुल सा बोल रहा
यहाँ ‘सा’ शब्द के प्रयोग से उपमा अलंकार है।
(घ) यमक अलंकार
‘कुल-कुल’ शब्द की पुनरावृत्ति से यमक अलंकार की छटा दृष्टिगत होती है।
भाषा और शैली
इस गीत की भाषा शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली है। इसमें कोमलकांत पदावली, लाक्षणिकता और प्रतीकात्मकता का अद्भुत सामंजस्य है।
- शब्द चयन अत्यंत मधुर और संगीतात्मक है।
- वाक्य संरचना सरल होते हुए भी गूढ़ भावों को व्यक्त करती है।
- छायावादी शैली की समस्त विशेषताएँ—रहस्य, प्रतीक, प्रकृति-सौंदर्य, आत्मानुभूति—इसमें विद्यमान हैं।
गीत की लयात्मकता इसे गेय बनाती है। प्रत्येक पंक्ति में मधुर संगीत की अनुभूति होती है।
रस और गुण
इस गीत में मुख्यतः श्रृंगार रस का संयोग पक्ष दृष्टिगत होता है, परंतु इसके साथ ही शान्त रस की छाया भी विद्यमान है।
माधुर्य गुण इसकी प्रमुख विशेषता है। कोमल ध्वनियाँ, मधुर शब्द और लयात्मक प्रवाह—इन सबके कारण यह गीत अत्यंत हृदयग्राही बन पड़ा है।
छायावादी विशेषताएँ
यह गीत छायावाद की प्रमुख विशेषताओं से युक्त है—
- प्रकृति के माध्यम से भावाभिव्यक्ति
- प्रतीकात्मकता
- मानवीकरण
- कोमल भावनाओं का चित्रण
- आत्मानुभूति और रहस्यात्मकता
छायावाद के प्रवर्तक कवियों में जयशंकर प्रसाद का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है, और यह गीत उनकी काव्य-प्रतिभा का उत्कृष्ट उदाहरण है।
सामाजिक और राष्ट्रीय संकेत
यद्यपि यह गीत व्यक्तिगत स्तर पर नायिका को संबोधित है, परंतु इसका व्यापक अर्थ समाज और राष्ट्र से भी जुड़ता है।
जब कवि कहते हैं—
बीती विभावरी जाग री।
तो यह मानो सोए हुए समाज के लिए पुकार है। यह संदेश है कि अंधकार का समय बीत चुका है; अब जागो और नवप्रभात का स्वागत करो।
इस प्रकार यह गीत केवल सौंदर्य का गीत नहीं, बल्कि प्रेरणा और चेतना का गीत भी है।
निष्कर्ष
‘बीती विभावरी’ हिंदी साहित्य का एक अमर प्रभात-गीत है। इसमें प्रकृति के माध्यम से नवचेतना, जागरण और आशा का संदेश दिया गया है। रूपक, मानवीकरण, उपमा और यमक जैसे अलंकारों से सुसज्जित यह गीत काव्य-सौष्ठव की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है।
इसकी मधुर, लयात्मक और प्रतीकात्मक भाषा पाठक के मन को मोह लेती है। प्रभात का जो हृदयस्पर्शी चित्र इसमें अंकित हुआ है, वह अद्वितीय है।
अतः कहा जा सकता है कि ‘बीती विभावरी’ केवल एक जागरण-गीत नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का मधुर संदेश है—अज्ञान से ज्ञान की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, और जड़ता से सृजन की ओर अग्रसर होने का आह्वान।
यही इसकी स्थायी महत्ता है और यही इसका काव्य-सौष्ठव।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
‘बीती विभावरी’ गीत के रचयिता कौन हैं?
‘बीती विभावरी’ के रचयिता महान छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद हैं। यह गीत उनके काव्य-संग्रह लहर में संकलित है।
‘बीती विभावरी’ का शाब्दिक अर्थ क्या है?
‘विभावरी’ का अर्थ है—रात्रि। ‘बीती विभावरी’ का अर्थ हुआ—रात बीत गई है। यह पंक्ति प्रभात के आगमन का संकेत देती है और जागरण का संदेश देती है।
‘बीती विभावरी’ को जागरण-गीत क्यों कहा जाता है?
इस गीत में सखी नायिका को जगाती है और प्रभात के सौन्दर्य का आनंद लेने के लिए प्रेरित करती है। यह जागरण केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक चेतना का भी प्रतीक है। इसलिए इसे जागरण-गीत कहा जाता है।
इस गीत में प्रकृति-चित्रण की क्या विशेषताएँ हैं?
गीत में उषा, तारे, आकाश, लतिका, किसलय और पक्षियों के माध्यम से प्रभात का अत्यंत सजीव, कोमल और मनोहारी चित्र प्रस्तुत किया गया है। प्रकृति के प्रत्येक तत्व का मानवीकरण किया गया है, जिससे चित्र जीवंत हो उठता है।
‘बीती विभावरी’ में कौन-कौन से अलंकारों का प्रयोग हुआ है?
इस गीत में रूपक, मानवीकरण, उपमा और यमक अलंकारों का सुंदर प्रयोग हुआ है। उदाहरण के लिए—
“अम्बर पनघट में डुबो रही तारा घट उषा नागरी” पंक्ति में रूपक और मानवीकरण अलंकार है।
महत्वपूर्ण दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (विस्तृत प्रश्नोत्तर FAQs)
‘बीती विभावरी’ गीत का मूल भाव विस्तारपूर्वक स्पष्ट कीजिए।
बीती विभावरी’ का मूल भाव जागरण, नवचेतना और आशा का संदेश है। यह गीत महान छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित है और उनके काव्य-संग्रह लहर में संकलित है।
‘विभावरी’ का अर्थ है—रात्रि। कवि जब कहते हैं—
“बीती विभावरी जाग री।”
तो यह केवल समय-सूचना नहीं है, बल्कि एक प्रतीकात्मक उद्घोष है। यहाँ ‘रात्रि’ अज्ञान, आलस्य, मोह और जड़ता का प्रतीक है, जबकि ‘उषा’ ज्ञान, प्रकाश, आशा और नवजीवन की प्रतीक है।
गीत में सखी नायिका को जगाती है और उसे प्रभात के मनोहर सौन्दर्य का अवलोकन करने के लिए प्रेरित करती है। उषा का चित्रण इस प्रकार किया गया है—
“अम्बर पनघट में डुबो रही
तारा घट उषा नागरी।”
यहाँ उषा को नागरी (स्त्री), आकाश को पनघट और तारों को घट (घड़े) कहा गया है। यह सांगरूपक अलंकार का सुंदर उदाहरण है। तारे डूब रहे हैं, अर्थात् अंधकार समाप्त हो रहा है।
नायिका का सोना मानव-चेतना की जड़ता का प्रतीक है। सखी की पुकार आत्मा की वह प्रेरणा है जो मनुष्य को निष्क्रियता से बाहर निकालती है।
इस प्रकार यह गीत केवल प्रकृति-वर्णन नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का संदेश है—
अंधकार से प्रकाश की ओर,
निष्क्रियता से सक्रियता की ओर,
और निराशा से आशा की ओर अग्रसर होने का आह्वान।
‘बीती विभावरी’ में प्रकृति-चित्रण की विशेषताओं का विस्तार से वर्णन कीजिए।
‘बीती विभावरी’ में प्रकृति का अत्यंत कोमल, सजीव और सौंदर्यमय चित्रण हुआ है। छायावादी कवियों की भाँति यहाँ भी प्रकृति को केवल दृश्य-वस्तु के रूप में नहीं, बल्कि भावनाओं की सहचरी के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
गीत में प्रभात का दृश्य अत्यंत आकर्षक है—
तारे अस्त हो रहे हैं।
उषा का आगमन हो रहा है।
शीतल, मंद, सुगंधित पवन बह रही है।
लताएँ और कलियाँ खिल रही हैं।
पक्षी मधुर स्वर में कलरव कर रहे हैं।
कवि लिखते हैं—
“खग कुल कुल कुल सा बोल रहा,
किसलय का अंचल डोल रहा।
लो यह लतिका भी भर लाई,
मधुमुकुल नवल रस गागरी।”
इन पंक्तियों में प्रकृति का मानवीकरण अत्यंत सुंदर है। ‘लतिका’ को ऐसे चित्रित किया गया है मानो वह नव-रस से भरी गागर लेकर आई हो। ‘किसलय का अंचल’—यहाँ पत्तों को नायिका के आँचल के समान बताया गया है।
पक्षियों का ‘कुल-कुल’ स्वर वातावरण को मधुरता से भर देता है। पवन के झोंकों से पत्तों का डोलना जीवन की चंचलता और ताजगी का संकेत है।
प्रकृति यहाँ न केवल दृश्यात्मक है, बल्कि भावात्मक भी है। वह नायिका को जगाने में सखी की सहायक बन जाती है।
‘बीती विभावरी’ के काव्य-सौष्ठव पर प्रकाश डालिए।
‘बीती विभावरी’ काव्य-सौष्ठव की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध रचना है। इसमें भाव और कला का सुंदर समन्वय है।
(1) अलंकार-विधान
रूपक अलंकार – “अम्बर पनघट”, “तारा घट”, “उषा नागरी”
मानवीकरण – उषा और लतिका को मानव रूप में चित्रित करना
उपमा अलंकार – “कुल-कुल सा बोल रहा”
यमक अलंकार – ‘कुल-कुल’ शब्द की पुनरावृत्ति
इन अलंकारों से कविता में सौंदर्य और प्रभाव की वृद्धि हुई है।
(2) भाषा-शैली
भाषा शुद्ध, साहित्यिक और कोमलकांत है। शब्द-चयन अत्यंत मधुर और लयात्मक है। प्रत्येक पंक्ति में संगीतात्मकता विद्यमान है।
(3) रस और गुण
मुख्यतः श्रृंगार रस की कोमलता दृष्टिगत होती है। साथ ही शान्त रस की छाया भी अनुभव होती है। माधुर्य गुण इस गीत की प्रमुख विशेषता है।
(4) प्रतीकात्मकता
गीत में प्रयुक्त प्रतीक इसे गहराई प्रदान करते हैं—
विभावरी = अज्ञान
उषा = ज्ञान
नायिका = मानव चेतना
सखी = जागृति की प्रेरणा
इस प्रकार काव्य-सौष्ठव के सभी तत्व—भाव, भाषा, अलंकार, लय और प्रतीक—इस गीत को उच्चकोटि की रचना बनाते हैं।
‘बीती विभावरी’ में निहित छायावादी विशेषताओं की विस्तृत विवेचना कीजिए।
‘बीती विभावरी’ छायावाद की प्रमुख विशेषताओं का उत्कृष्ट उदाहरण है। छायावाद में आत्मानुभूति, प्रकृति-प्रेम, रहस्यात्मकता और प्रतीकात्मकता का विशेष महत्व है।
इस गीत में—
प्रकृति-प्रेम – प्रकृति का कोमल और सजीव चित्रण।
मानवीकरण – प्रकृति के तत्वों को मानवीय रूप प्रदान करना।
प्रतीकात्मकता – रात्रि और उषा के माध्यम से जीवन-दर्शन।
आत्मानुभूति – जागरण का आह्वान आत्मिक चेतना से जुड़ा है।
संगीतात्मकता – लय और माधुर्य का प्रभाव।
छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में जयशंकर प्रसाद का महत्वपूर्ण स्थान है, और यह गीत उनकी काव्य-दृष्टि का सशक्त प्रमाण है।
‘बीती विभावरी’ गीत का सामाजिक, दार्शनिक एवं राष्ट्रीय महत्व स्पष्ट कीजिए।
‘बीती विभावरी’ केवल एक व्यक्तिगत जागरण-गीत नहीं है; इसका व्यापक सामाजिक, दार्शनिक और राष्ट्रीय महत्व भी है।
(1) सामाजिक महत्व
नायिका का सोना समाज की निष्क्रियता का प्रतीक है। सखी का पुकारना सामाजिक चेतना का स्वर है। यह संदेश देता है कि आलस्य त्यागकर सक्रिय जीवन अपनाना चाहिए।
(2) दार्शनिक महत्व
रात्रि और उषा का द्वंद्व जीवन के अंधकार और प्रकाश का प्रतीक है। यह गीत जीवन के आशावादी दर्शन को प्रस्तुत करता है—हर अंधकार के बाद प्रकाश अवश्य आता है।
(3) राष्ट्रीय महत्व
छायावाद का काल भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम का काल था। ऐसे समय में जागरण का यह संदेश राष्ट्रीय चेतना को भी प्रेरित करता था। “जाग री” की पुकार सोए हुए राष्ट्र को जगाने का प्रतीक बन जाती है।
अतः यह गीत केवल सौन्दर्य का चित्रण नहीं, बल्कि प्रेरणा, चेतना और नवजीवन का घोष है।
‘बीती विभावरी’ में निहित प्रतीकात्मकता और छायावादी तत्वों की विवेचना
‘बीती विभावरी’ महान छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित एक अत्यंत मधुर और भावगर्भित गीत है, जो उनके काव्य-संग्रह लहर में संकलित है। यह गीत केवल प्रभातकालीन प्रकृति का वर्णन मात्र नहीं है, बल्कि इसमें गहन प्रतीकात्मकता और छायावादी काव्य-धारा की विशिष्ट विशेषताएँ समाहित हैं।
इस प्रश्न का उत्तर देते समय हमें दो मुख्य पक्षों पर विचार करना होगा—
- गीत में निहित प्रतीकात्मकता
- छायावादी तत्वों की उपस्थिति और प्रभाव
1. ‘बीती विभावरी’ में प्रतीकात्मकता
छायावादी काव्य की प्रमुख विशेषता है—भावों की अभिव्यक्ति प्रतीकों के माध्यम से करना। ‘बीती विभावरी’ में भी कवि ने अनेक प्रतीकों के द्वारा गहन जीवन-दर्शन प्रस्तुत किया है।
(क) ‘विभावरी’ (रात्रि) का प्रतीक
‘विभावरी’ का अर्थ है—रात्रि। गीत की पहली ही पंक्ति—
“बीती विभावरी जाग री।”
यहाँ ‘रात्रि’ केवल समय का बोध नहीं कराती, बल्कि यह अज्ञान, मोह, आलस्य, निराशा और जड़ता का प्रतीक है।
रात्रि का बीतना इस बात का संकेत है कि अंधकार समाप्त हो चुका है। यह जीवन के दुःख, निराशा और अज्ञान के समाप्त होने का प्रतीक है।
(ख) ‘उषा’ का प्रतीक
उषा इस गीत में अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीक है। कवि कहते हैं—
“अम्बर पनघट में डुबो रही
तारा घट उषा नागरी।”
यहाँ उषा को ‘नागरी’ (स्त्री) कहा गया है। उषा ज्ञान, आशा, नवजीवन और जागृति की प्रतीक है।
जैसे उषा के आगमन से अंधकार दूर हो जाता है, वैसे ही ज्ञान और चेतना के आगमन से जीवन का अज्ञान दूर हो जाता है।
(ग) ‘तारे’ का प्रतीक
तारे यहाँ रात्रि के अंश हैं। वे म्लान होते हुए पुराने विचारों, भ्रमों और निष्क्रियता के प्रतीक हैं।
उषा द्वारा ‘तारा-घट’ को डुबोना इस बात का प्रतीक है कि पुरानी जड़ता समाप्त हो रही है और नई चेतना उदित हो रही है।
(घ) ‘नायिका’ का प्रतीक
गीत में नायिका सोई हुई है। वह मानव-चेतना का प्रतीक है जो अभी तक जागृत नहीं हुई।
सखी का उसे जगाना आत्मा की पुकार है—एक ऐसी आंतरिक आवाज जो मनुष्य को जीवन में सक्रिय होने और जागरूक बनने के लिए प्रेरित करती है।
(ङ) ‘सखी’ का प्रतीक
सखी यहाँ प्रेरणा, विवेक और अंतःप्रेरणा का प्रतीक है। वह नायिका को जगाकर कहती है कि अब आलस्य त्यागो और प्रभात के सौंदर्य का अनुभव करो।
यह मानो जीवन में मिलने वाली वह प्रेरणा है जो मनुष्य को नवजीवन की ओर अग्रसर करती है।
(च) प्रकृति के अन्य प्रतीक
गीत की पंक्तियाँ—
“खग कुल कुल कुल सा बोल रहा,
किसलय का अंचल डोल रहा।
लो यह लतिका भी भर लाई,
मधुमुकुल नवल रस गागरी।”
यहाँ—
- खग (पक्षी) – जीवन की सक्रियता और उल्लास के प्रतीक हैं।
- किसलय – कोमल भावनाओं और नवजीवन के प्रतीक हैं।
- लतिका – सौंदर्य और सृजनशीलता की प्रतीक है।
- मधुमुकुल – प्रेम और जीवन-रस का प्रतीक है।
इस प्रकार पूरा वातावरण नवचेतना और नवसृजन का प्रतीक बन जाता है।
2. ‘बीती विभावरी’ में छायावादी तत्व
छायावाद हिंदी काव्य का वह युग है जिसमें आत्मानुभूति, प्रकृति-प्रेम, रहस्य और प्रतीकात्मकता को विशेष महत्व मिला। ‘बीती विभावरी’ इन सभी तत्वों से परिपूर्ण है।
(क) प्रकृति-प्रेम
छायावाद की एक प्रमुख विशेषता है—प्रकृति के माध्यम से भावों की अभिव्यक्ति।
इस गीत में प्रकृति का अत्यंत कोमल और सजीव चित्रण है। प्रभात का दृश्य, पवन का बहना, पत्तों का डोलना, पक्षियों का कलरव—ये सब प्रकृति-प्रेम के उदाहरण हैं।
(ख) मानवीकरण
प्रकृति के तत्वों को मानव रूप देना छायावादी काव्य की विशेषता है।
- उषा को ‘नागरी’ कहा गया है।
- लतिका को गागर भर लाने वाली स्त्री के रूप में चित्रित किया गया है।
- किसलयों को ‘अंचल’ कहा गया है।
इससे प्रकृति जीवंत और भावमयी बन जाती है।
(ग) आत्मानुभूति
छायावाद में कवि की अंतःचेतना और व्यक्तिगत अनुभूति को महत्व दिया जाता है।
यहाँ जागरण केवल बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक है। नायिका का जागना आत्मा के जागरण का प्रतीक है।
(घ) रहस्यात्मकता
गीत में प्रत्यक्ष कथन की अपेक्षा सांकेतिक और प्रतीकात्मक शैली अपनाई गई है।
रात्रि, उषा, तारे, लतिका—ये सभी गहरे अर्थ समेटे हुए हैं। यही रहस्यात्मकता छायावाद की पहचान है।
(ङ) संगीतात्मकता और माधुर्य
छायावादी कविता में लय और माधुर्य का विशेष महत्व है।
‘कुल-कुल’ जैसे शब्दों का प्रयोग, कोमल ध्वनियाँ, लयात्मक पंक्तियाँ—ये सब गीत को संगीतात्मक बनाते हैं।
गीत में माधुर्य गुण प्रमुख रूप से विद्यमान है।
(च) श्रृंगार और कोमल भावनाएँ
छायावाद में कोमल भावनाओं का चित्रण होता है। इस गीत में प्रभात का कोमल सौंदर्य, लता और कलियों का वर्णन, सखी और नायिका का संवाद—ये सब श्रृंगार रस की कोमल छाया प्रस्तुत करते हैं।
समग्र मूल्यांकन
‘बीती विभावरी’ प्रतीकात्मकता और छायावादी तत्वों का अत्यंत सुंदर समन्वय है।
- रात्रि और उषा के माध्यम से जीवन-दर्शन प्रस्तुत किया गया है।
- प्रकृति के माध्यम से नवचेतना का संदेश दिया गया है।
- प्रतीकों के माध्यम से अज्ञान से ज्ञान की यात्रा का चित्रण हुआ है।
- छायावादी शैली के सभी प्रमुख तत्व—प्रकृति-प्रेम, मानवीकरण, आत्मानुभूति, रहस्य और माधुर्य—इस गीत में समाहित हैं।
अतः कहा जा सकता है कि ‘बीती विभावरी’ केवल एक प्रभात-गीत नहीं, बल्कि जीवन के आध्यात्मिक और दार्शनिक जागरण का काव्यमय घोष है। यह गीत आज भी पाठकों को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है।
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