असम के मानस बायोस्फीयर रिजर्व में एशियाई घास छिपकली की नई प्रजाति ‘ताकीड्रोमस उल्टापैनेंसिस’ की खोज

हाल ही में भारत के उत्तर–पूर्वी क्षेत्र से जैव विविधता के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण खोज सामने आई है। वैज्ञानिकों ने असम के प्रसिद्ध Manas Biosphere Reserve के भीतर स्थित उल्टापानी आरक्षित वन में एशियाई घास छिपकली की एक नई प्रजाति की पहचान की है। इस नई प्रजाति का वैज्ञानिक नाम Takydromus ultapanensis रखा गया है।

यह खोज न केवल भारत के सरीसृप (Reptile) जैव-विविधता के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि उत्तर-पूर्व भारत के पारिस्थितिकी तंत्र की समृद्धि और वैज्ञानिक महत्व को भी उजागर करती है। इस प्रजाति का नाम इसके खोज स्थल उल्टापानी आरक्षित वन के आधार पर रखा गया है, जो असम के कोकराझार जिले में स्थित है और मानस बायोस्फीयर लैंडस्केप का एक महत्वपूर्ण भाग है।

इस नई प्रजाति की खोज से वैज्ञानिकों को यह समझने में भी मदद मिली है कि उत्तर–पूर्व भारत का क्षेत्र सरीसृपों के विकास और विविधता के लिए कितना महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही यह खोज संरक्षण के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस क्षेत्र में कई दुर्लभ और संकटग्रस्त प्रजातियाँ पाई जाती हैं।

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ताकीड्रोमस उल्टापैनेंसिस: एक नई एशियाई घास छिपकली

नई खोजी गई प्रजाति Takydromus ultapanensis एशियाई घास छिपकली समूह से संबंधित है। यह समूह आमतौर पर घास के मैदानों, झाड़ियों और नम जंगलों में रहने वाली पतली और फुर्तीली छिपकलियों के लिए जाना जाता है।

सामान्य नाम

इस प्रजाति को सामान्य रूप से एशियाई घास छिपकली (Asian Grass Lizard) कहा जाता है।

खोज का स्थान

इस प्रजाति की खोज असम के कोकराझार जिले में स्थित उल्टापानी आरक्षित वन में हुई है। यह क्षेत्र Ultapani Reserved Forest के नाम से जाना जाता है और मानस बायोस्फीयर रिजर्व का हिस्सा है।

यह वन क्षेत्र प्राकृतिक रूप से समृद्ध है और यहाँ विभिन्न प्रकार के घास के मैदान, दलदली क्षेत्र और अर्ध-सदाबहार वन पाए जाते हैं, जो सरीसृपों के लिए आदर्श आवास प्रदान करते हैं।

वंश (Genus): ताकीड्रोमस

यह प्रजाति Takydromus वंश से संबंधित है। इस वंश की छिपकलियाँ मुख्य रूप से एशिया के विभिन्न क्षेत्रों में पाई जाती हैं, जिनमें भारत, चीन, जापान और दक्षिण–पूर्व एशिया शामिल हैं।

ताकीड्रोमस वंश की छिपकलियों की विशेषता यह है कि उनका शरीर पतला और लंबा होता है तथा उनकी पूँछ शरीर की लंबाई से भी अधिक हो सकती है। ये छिपकलियाँ अत्यंत तेज गति से घास और झाड़ियों के बीच दौड़ने में सक्षम होती हैं।

विशिष्ट आवास (Habitat)

आमतौर पर ताकीड्रोमस वंश की अन्य प्रजातियाँ पर्वतीय या उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाई जाती हैं। उदाहरण के लिए:

  • Takydromus khasiensis
  • Takydromus sikkimensis

लेकिन Takydromus ultapanensis की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह निचले इलाकों के अर्ध-सदाबहार जंगलों में पाई गई है।

यह छिपकली विशेष रूप से निम्न स्थानों में पाई गई है:

  • जलभराव वाले घास के मैदान
  • फर्न के घने पैच
  • मौसमी जल धाराओं के आसपास के खुले स्थान

शोधकर्ताओं ने इसे अक्सर फर्न की झाड़ियों पर बैठकर धूप सेंकते हुए देखा है। यह व्यवहार सरीसृपों में सामान्य है, क्योंकि वे अपने शरीर के तापमान को नियंत्रित करने के लिए धूप का उपयोग करते हैं।

शारीरिक संरचना और पहचान

Takydromus ultapanensis की पहचान इसके विशिष्ट शारीरिक लक्षणों के आधार पर की गई है।

प्रमुख शारीरिक विशेषताएँ

  1. स्केल पैटर्न (Scale Pattern)
    इसके शरीर पर मौजूद स्केल (खाल के छोटे-छोटे प्लेटनुमा हिस्से) अन्य संबंधित प्रजातियों से अलग हैं।
  2. शरीर का अनुपात
    इसके शरीर की लंबाई और पूँछ का अनुपात अन्य ताकीड्रोमस प्रजातियों से अलग पाया गया है।
  3. सिर की संरचना
    इसके सिर की बनावट और आकार इसे अन्य प्रजातियों से अलग पहचान देते हैं।
  4. रंग और बनावट
    यह घास और फर्न के बीच आसानी से छिपने योग्य रंगों की होती है, जिससे यह शिकारी जीवों से बच पाती है।

इन विशेषताओं के कारण वैज्ञानिकों को यह स्पष्ट हुआ कि यह कोई ज्ञात प्रजाति नहीं बल्कि एक नई प्रजाति है।

आनुवंशिक विश्लेषण से पुष्टि

नई प्रजाति की पुष्टि के लिए वैज्ञानिकों ने आधुनिक DNA विश्लेषण तकनीकों का उपयोग किया।

इस अध्ययन में दो प्रमुख जीनों का विश्लेषण किया गया:

  • 12S rRNA जीन
  • COI जीन

इन जीनों के अध्ययन से यह पता चला कि Takydromus ultapanensis अन्य ज्ञात ताकीड्रोमस प्रजातियों से आनुवंशिक रूप से अलग है।

इस विश्लेषण से यह भी स्पष्ट हुआ कि यह केवल किसी अन्य प्रजाति का स्थानीय रूप (local variant) नहीं है, बल्कि एक स्वतंत्र और विशिष्ट विकासवादी वंश (Evolutionary lineage) है।

उत्तर–पूर्व भारत में ताकीड्रोमस प्रजातियों की संख्या

इस नई खोज के बाद उत्तर–पूर्व भारत में ताकीड्रोमस वंश की ज्ञात प्रजातियों की संख्या बढ़कर पाँच हो गई है।

यह तथ्य इस क्षेत्र की जैव विविधता और विकासवादी महत्व को दर्शाता है।

उत्तर–पूर्व भारत को पहले से ही जैव विविधता का हॉटस्पॉट माना जाता है और यहाँ कई दुर्लभ तथा स्थानिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं।

मानस बायोस्फीयर रिजर्व: एक जैव विविधता का खजाना

नई प्रजाति की खोज जिस क्षेत्र में हुई है वह Manas National Park के व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा है।

यह क्षेत्र विश्व स्तर पर अपनी जैव विविधता और संरक्षण के लिए प्रसिद्ध है।

भौगोलिक स्थिति

Manas Biosphere Reserve असम के हिमालय की तलहटी में स्थित है।

यह उत्तर दिशा में भूटान के प्रसिद्ध Royal Manas National Park से जुड़ा हुआ है और दोनों मिलकर एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय पारिस्थितिकी क्षेत्र बनाते हैं।

नाम का उद्गम

इस क्षेत्र का नाम Manas River के नाम पर रखा गया है।

मानस नदी का नाम हिंदू पौराणिक कथाओं की सर्प देवी Manasa से प्रेरित है।

बहु-स्तरीय संरक्षण दर्जा

मानस क्षेत्र को कई महत्वपूर्ण संरक्षण दर्जे प्राप्त हैं:

  • राष्ट्रीय उद्यान
  • टाइगर रिजर्व
  • एलीफेंट रिजर्व
  • बायोस्फीयर रिजर्व
  • UNESCO विश्व धरोहर स्थल

इन सभी दर्जों के कारण यह क्षेत्र वैश्विक स्तर पर अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

नदी तंत्र

इस क्षेत्र की प्रमुख नदी Manas River है, जो आगे चलकर भारत की महान नदी Brahmaputra River में मिल जाती है।

इसके अलावा यहाँ दो अन्य नदियाँ भी बहती हैं:

  • बेकी नदी
  • हाकवा नदी

ये नदियाँ यहाँ के पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

विविध पारिस्थितिकी तंत्र

मानस बायोस्फीयर रिजर्व में विभिन्न प्रकार के पारिस्थितिकी तंत्र पाए जाते हैं, जैसे:

  • तराई-भाबर घास के मैदान
  • उष्णकटिबंधीय अर्ध-सदाबहार वन
  • नम पर्णपाती वन

इन विभिन्न पारिस्थितिकी तंत्रों के कारण यहाँ वन्यजीवों की असाधारण विविधता पाई जाती है।

स्थानिक प्रजातियाँ

यह क्षेत्र कई स्थानिक (Endemic) प्रजातियों के लिए प्रसिद्ध है।

दुनिया में केवल यहीं प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली प्रजाति है:

  • Pygmy Hog

यह दुनिया का सबसे छोटा जंगली सूअर है और अत्यंत संकटग्रस्त श्रेणी में आता है।

प्रमुख वन्यजीव

मानस बायोस्फीयर रिजर्व में कई दुर्लभ और प्रसिद्ध प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जैसे:

  • Golden Langur
  • Assam Roofed Turtle
  • Hispid Hare
  • Indian Rhinoceros

ये सभी प्रजातियाँ इस क्षेत्र की जैव विविधता को दर्शाती हैं।

जंगली जल भैंसा की शुद्ध नस्ल

मानस क्षेत्र भारत में Wild Water Buffalo की शुद्ध जंगली नस्ल का एकमात्र महत्वपूर्ण आवास माना जाता है।

यह प्रजाति विश्व स्तर पर संकटग्रस्त मानी जाती है।

पक्षी विविधता

इस क्षेत्र को BirdLife International द्वारा महत्वपूर्ण पक्षी क्षेत्र (Important Bird Area – IBA) घोषित किया गया है।

यहाँ संकटग्रस्त पक्षी Bengal Florican का प्रमुख आवास है।

वनस्पति संपदा

मानस बायोस्फीयर रिजर्व में वनस्पतियों की भी अत्यंत समृद्ध विविधता है।

यहाँ लगभग 543 से अधिक पौधों की प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें शामिल हैं:

  • 15 दुर्लभ ऑर्किड प्रजातियाँ
  • 18 दुर्लभ फर्न प्रजातियाँ

यही फर्न प्रजातियाँ संभवतः Takydromus ultapanensis के लिए आदर्श आवास प्रदान करती हैं।

प्रशासनिक विभाजन

मानस बायोस्फीयर रिजर्व को प्रशासनिक रूप से तीन मुख्य रेंजों में विभाजित किया गया है:

  1. बांसबारी रेंज (मध्य)
  2. पानबारी रेंज (पश्चिम)
  3. भुइयापारा रेंज (पूर्व)

इन रेंजों के माध्यम से वन संरक्षण और वन्यजीव प्रबंधन को प्रभावी रूप से संचालित किया जाता है।

सांस्कृतिक महत्व

मानस क्षेत्र केवल प्राकृतिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी अत्यंत समृद्ध है।

यहाँ कई स्वदेशी जनजातियाँ रहती हैं, जिनमें प्रमुख हैं:

  • बोडो
  • रभा
  • मिशिंग

इन जनजातियों का जीवन जंगल और प्रकृति से गहराई से जुड़ा हुआ है। वे पारंपरिक ज्ञान और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

पुरातात्विक महत्व

मानस बायोस्फीयर रिजर्व के भीतर कई प्राचीन ऐतिहासिक संरचनाएँ भी पाई गई हैं।

यहाँ 5वीं–6वीं शताब्दी के पत्थर के ढाँचे और खंडहर पाए गए हैं, जिनमें बाणासुर का गोहैन नामक स्थल विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

ये अवशेष इस क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व को भी दर्शाते हैं।

नई प्रजाति की खोज का महत्व

Takydromus ultapanensis की खोज कई कारणों से महत्वपूर्ण है:

  1. यह उत्तर–पूर्व भारत की जैव विविधता को और समृद्ध बनाती है।
  2. यह क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र के वैज्ञानिक अध्ययन को आगे बढ़ाती है।
  3. यह संरक्षण प्रयासों की आवश्यकता को उजागर करती है।
  4. यह दर्शाती है कि भारत के जंगलों में अभी भी कई अनदेखी प्रजातियाँ मौजूद हो सकती हैं।

निष्कर्ष

असम के मानस बायोस्फीयर रिजर्व में खोजी गई Takydromus ultapanensis एशियाई घास छिपकली की नई प्रजाति भारत की समृद्ध जैव विविधता का एक और उदाहरण है।

यह खोज वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद करती है कि उत्तर–पूर्व भारत का पारिस्थितिकी तंत्र कितना जटिल और महत्वपूर्ण है।

साथ ही यह खोज यह भी बताती है कि यदि इन प्राकृतिक क्षेत्रों का संरक्षण सही तरीके से किया जाए, तो आने वाले समय में और भी कई नई प्रजातियाँ सामने आ सकती हैं।

इस प्रकार मानस बायोस्फीयर रिजर्व न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया के लिए जैव विविधता का एक अनमोल खजाना है।


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