भारत प्राकृतिक और मानवजनित दोनों प्रकार की आपदाओं के प्रति अत्यंत संवेदनशील देश है। भूकंप, बाढ़, चक्रवात, भूस्खलन, औद्योगिक दुर्घटनाएँ, रेल और विमान हादसे जैसी घटनाएँ समय-समय पर देश के विभिन्न क्षेत्रों को प्रभावित करती रही हैं। इन आपदाओं में न केवल भारी जन-धन की हानि होती है, बल्कि मृतकों की पहचान करना भी एक बड़ी चुनौती बन जाता है। कई बार शवों की स्थिति इतनी खराब होती है कि उनकी पहचान करना कठिन हो जाता है, जिससे पीड़ित परिवारों को लंबे समय तक मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ती है।
इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने हाल ही में “आपदा पीड़ित पहचान और प्रबंधन (Disaster Victim Identification – DVI)” पर भारत का पहला व्यापक मानक संचालन प्रक्रिया (Standard Operating Procedure – SOP) और विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं। यह पहल भारत में आपदा प्रबंधन प्रणाली को अधिक वैज्ञानिक, संगठित और मानवीय बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
आपदा पीड़ित पहचान (DVI) क्या है?
आपदा पीड़ित पहचान (DVI) वह वैज्ञानिक और व्यवस्थित प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से आपदा में मारे गए व्यक्तियों की सही पहचान की जाती है। यह प्रक्रिया न केवल कानूनी दृष्टि से आवश्यक होती है, बल्कि मृतकों के परिवारों को मानसिक संतोष और सामाजिक न्याय प्रदान करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
NDMA द्वारा जारी नए दिशानिर्देशों में इस प्रक्रिया को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप विकसित किया गया है। विशेष रूप से, इन दिशानिर्देशों को इंटरपोल (Interpol) द्वारा निर्धारित वैश्विक मानकों के आधार पर तैयार किया गया है, जिससे भारत में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया विश्व स्तर पर मान्य और विश्वसनीय बन सके।
DVI दिशानिर्देशों की आवश्यकता क्यों पड़ी?
भारत में पहले भी कई बड़े हादसे हुए हैं, जैसे सुनामी, उत्तराखंड की बाढ़, केदारनाथ आपदा, विमान दुर्घटनाएँ और रेल हादसे। इन घटनाओं में बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु हुई, लेकिन कई मामलों में शवों की पहचान करना बेहद कठिन साबित हुआ।
पहले की व्यवस्थाओं में कई समस्याएँ देखने को मिलीं—
- विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी
- वैज्ञानिक तकनीकों का सीमित उपयोग
- डेटा संग्रह की असंगठित प्रणाली
- पीड़ित परिवारों के साथ संवाद और सहायता की कमी
इन कमियों को दूर करने और एक एकीकृत राष्ट्रीय प्रणाली विकसित करने के लिए NDMA ने यह SOP जारी किया है।
NDMA द्वारा निर्धारित चार-चरणीय DVI प्रक्रिया
NDMA ने आपदा पीड़ित पहचान के लिए एक वैज्ञानिक और व्यवस्थित चार-चरणीय प्रोटोकॉल निर्धारित किया है। यह प्रक्रिया पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय मानकों पर आधारित है।
1. व्यवस्थित पुनर्प्राप्ति (Systematic Recovery)
यह DVI प्रक्रिया का पहला और अत्यंत महत्वपूर्ण चरण है। इसमें आपदा स्थल से मानव अवशेषों को सावधानीपूर्वक प्राप्त किया जाता है।
इस चरण के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं:
- आपदा स्थल की वैज्ञानिक मैपिंग करना
- अवशेषों को व्यवस्थित रूप से एकत्र करना
- प्रत्येक अवशेष को टैग और लेबल करना
- साक्ष्य की शुद्धता बनाए रखना
यह प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि कोई भी अवशेष छूट न जाए और सभी साक्ष्यों का सही रिकॉर्ड तैयार हो सके। इस चरण में प्रशिक्षित बचाव दल, फॉरेंसिक विशेषज्ञ और पुलिस विभाग का समन्वित सहयोग आवश्यक होता है।
2. शव-परीक्षा डेटा संग्रह (Post-Mortem Data Collection)
इस चरण में मृतकों से वैज्ञानिक तरीके से डेटा एकत्र किया जाता है। इसमें निम्नलिखित प्रमुख तत्व शामिल होते हैं:
- फिंगरप्रिंट (Fingerprints): पहचान के सबसे विश्वसनीय तरीकों में से एक।
- डीएनए परीक्षण (DNA Analysis): जब शव अत्यधिक क्षतिग्रस्त हो, तब डीएनए पहचान का सबसे सटीक माध्यम होता है।
- दंत रिकॉर्ड (Dental Records): दांत और जबड़े लंबे समय तक सुरक्षित रहते हैं, इसलिए यह पहचान में अत्यंत उपयोगी होते हैं।
- शारीरिक निशान: जैसे टैटू, जन्मचिह्न, चोट के निशान या सर्जरी के निशान।
यह डेटा विशेषज्ञ फॉरेंसिक टीम द्वारा अत्यंत सावधानी से एकत्र किया जाता है।
3. पूर्व-मृत्यु डेटा संग्रह (Ante-Mortem Data Collection)
इस चरण में मृत व्यक्ति से संबंधित जानकारी उसके परिवार या परिचितों से प्राप्त की जाती है।
इसमें शामिल होते हैं:
- चिकित्सा रिकॉर्ड
- दंत चिकित्सा इतिहास
- पहचान पत्र और फोटो
- शारीरिक विशेषताएँ
- डीएनए नमूने (परिवार से)
यह डेटा मृतक की पहचान स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
4. मिलान और सामंजस्य (Reconciliation)
यह DVI प्रक्रिया का अंतिम चरण होता है। इसमें शव-परीक्षा डेटा और पूर्व-मृत्यु डेटा का वैज्ञानिक मिलान किया जाता है।
इस प्रक्रिया के बाद:
- मृतक की पहचान की आधिकारिक पुष्टि की जाती है
- कानूनी प्रक्रिया पूरी की जाती है
- मृतक के अवशेष सम्मानपूर्वक परिवार को सौंपे जाते हैं
यह चरण अत्यंत संवेदनशील होता है, क्योंकि इससे परिवार को अपने प्रियजन की पहचान और अंतिम संस्कार का अवसर मिलता है।
NDMA की प्रमुख सिफारिशें और नई तकनीकें
NDMA ने केवल पारंपरिक प्रक्रियाओं तक सीमित न रहते हुए कई आधुनिक और क्रांतिकारी उपायों का सुझाव दिया है।
1. नेशनल डेंटल डेटा रजिस्ट्री (National Dental Data Registry)
दिशानिर्देशों में एक राष्ट्रीय स्तर का दंत डेटा बैंक बनाने का प्रस्ताव रखा गया है।
इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि:
- दांत और जबड़े अत्यधिक टिकाऊ होते हैं
- आग, विस्फोट या सड़न के बावजूद सुरक्षित रह सकते हैं
- दंत संरचना प्रत्येक व्यक्ति की अलग होती है
यदि यह डेटाबेस स्थापित हो जाता है, तो भविष्य में आपदाओं में मृतकों की पहचान अधिक तेज और सटीक हो सकेगी।
2. फॉरेंसिक पुरातत्व (Forensic Archaeology)
भूस्खलन या पुरानी आपदाओं में कई बार शव मिट्टी या मलबे में दब जाते हैं। ऐसे मामलों में फॉरेंसिक पुरातत्व का उपयोग किया जाएगा।
इस तकनीक में:
- वैज्ञानिक उत्खनन किया जाता है
- मिट्टी की परतों का अध्ययन किया जाता है
- अवशेषों को सावधानीपूर्वक खोजा जाता है
यह विधि विशेष रूप से उन मामलों में उपयोगी होती है, जहां शव लंबे समय तक दबे रहते हैं।
3. ‘नो मास ऑटोप्सी’ नीति (No Mass Autopsies)
NDMA ने सामूहिक मृत्यु की स्थिति में हर शव का पोस्टमार्टम अनिवार्य न करने का सुझाव दिया है।
यदि पहचान अन्य वैज्ञानिक तरीकों से संभव हो, तो पोस्टमार्टम से बचा जा सकता है।
इस नीति के लाभ:
- समय की बचत
- संसाधनों का बेहतर उपयोग
- मृतकों के प्रति सम्मान और मानवीय संवेदनशीलता
4. मानवीय फॉरेंसिक (Humanitarian Forensics)
NDMA ने केवल वैज्ञानिक प्रक्रिया पर ही नहीं, बल्कि मानवीय पहलुओं पर भी विशेष जोर दिया है।
इसमें शामिल हैं:
- पीड़ित परिवारों को परामर्श (Counselling) प्रदान करना
- भावनात्मक सहायता देना
- परिवारों के साथ संवेदनशील संवाद बनाए रखना
यह पहल आपदा प्रबंधन को अधिक मानवीय और संवेदनशील बनाती है।
DVI दिशानिर्देशों के संभावित लाभ
NDMA द्वारा जारी ये दिशानिर्देश कई स्तरों पर लाभकारी साबित हो सकते हैं:
1. पहचान प्रक्रिया में सटीकता
वैज्ञानिक तकनीकों के उपयोग से पहचान की गलतियों की संभावना कम होगी।
2. समय की बचत
व्यवस्थित प्रक्रिया से पहचान कार्य तेजी से पूरा किया जा सकेगा।
3. कानूनी प्रक्रिया में सुविधा
सटीक पहचान से मृत्यु प्रमाण पत्र, बीमा और अन्य कानूनी प्रक्रियाएं आसान होंगी।
4. परिवारों को मानसिक राहत
प्रियजनों की पहचान होने से परिवारों को भावनात्मक संतोष मिलेगा।
5. अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप व्यवस्था
भारत की आपदा प्रबंधन प्रणाली वैश्विक स्तर पर मजबूत होगी।
कार्यान्वयन में संभावित चुनौतियाँ
हालांकि यह पहल अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके कार्यान्वयन में कुछ चुनौतियाँ भी सामने आ सकती हैं:
- प्रशिक्षित फॉरेंसिक विशेषज्ञों की कमी
- तकनीकी संसाधनों की उपलब्धता
- राष्ट्रीय डेटा रजिस्ट्री का निर्माण
- विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय
- ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में सुविधा का अभाव
इन चुनौतियों को दूर करने के लिए सरकार को निरंतर प्रशिक्षण, निवेश और तकनीकी विकास पर ध्यान देना होगा।
भारत में आपदा प्रबंधन प्रणाली का सुदृढ़ीकरण
NDMA के इन दिशानिर्देशों से भारत की आपदा प्रबंधन प्रणाली और मजबूत होगी। यह पहल केवल मृतकों की पहचान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे आपदा प्रबंधन तंत्र को वैज्ञानिक और संवेदनशील बनाने का प्रयास है।
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में ऐसी व्यवस्था अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि यहां आपदाओं की प्रकृति और स्वरूप अलग-अलग होते हैं।
निष्कर्ष
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा जारी आपदा पीड़ित पहचान और प्रबंधन (DVI) के नए दिशानिर्देश भारत की आपदा प्रबंधन प्रणाली में एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण पहल हैं। यह न केवल वैज्ञानिक तकनीकों के उपयोग को बढ़ावा देते हैं, बल्कि मानवीय संवेदनशीलता को भी प्राथमिकता देते हैं।
चार-चरणीय वैज्ञानिक प्रक्रिया, आधुनिक तकनीकों का उपयोग, राष्ट्रीय डेटाबेस की स्थापना और पीड़ित परिवारों को भावनात्मक सहयोग प्रदान करने जैसी पहलें भविष्य में आपदाओं के दौरान मृतकों की पहचान को अधिक सटीक और व्यवस्थित बनाएंगी।
यदि इन दिशानिर्देशों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो भारत आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में विश्व के अग्रणी देशों में शामिल हो सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह पहल उन परिवारों को सम्मान और मानसिक संतोष प्रदान करेगी, जिन्होंने आपदाओं में अपने प्रियजनों को खोया है।
इस प्रकार, NDMA का यह कदम न केवल प्रशासनिक सुधार है, बल्कि यह मानवता और संवेदनशीलता की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
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