कश्मीरी पंडित समुदाय का ‘हेरथ’ महोत्सव: आस्था, दर्शन और सांस्कृतिक निरंतरता का अद्वितीय पर्व

हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीरी पंडित समुदाय को उनके सबसे महत्वपूर्ण पर्व ‘हेरथ’ के अवसर पर पारंपरिक अभिवादन “हेरथ पोश्ते” कहकर शुभकामनाएँ दीं। यह केवल एक औपचारिक बधाई नहीं थी, बल्कि उस प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा के प्रति सम्मान का प्रतीक थी, जिसने सदियों के उतार-चढ़ाव, राजनीतिक परिवर्तन और सामाजिक विस्थापन के बावजूद अपनी जीवंतता बनाए रखी है। ‘हेरथ’ कश्मीरी पंडित समुदाय का सबसे प्राचीन और सर्वाधिक महत्वपूर्ण सामाजिक-धार्मिक उत्सव है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि कश्मीर की सांस्कृतिक स्मृति, दार्शनिक परंपरा और सामुदायिक एकता का सशक्त प्रतीक है।

हेरथ का अर्थ और उत्पत्ति

‘हेरथ’ शब्द संस्कृत के ‘हररात्रि’ (Hararatri) से निकला है, जिसका अर्थ है ‘हर की रात्रि’ या ‘शिव की रात’। समय के साथ ‘हररात्रि’ का अपभ्रंश होकर ‘हेरथ’ शब्द प्रचलन में आया। यह पर्व व्यापक भारतीय परंपरा में मनाई जाने वाली महाशिवरात्रि से संबद्ध है, किंतु कश्मीरी पंडितों के लिए इसका स्वरूप, महत्व और अनुष्ठानिक विधियाँ विशिष्ट हैं।

जहाँ देश के अन्य भागों में महाशिवरात्रि एक या दो दिन का व्रत-उपवास और पूजा का पर्व है, वहीं कश्मीरी पंडित समुदाय में ‘हेरथ’ एक विस्तृत उत्सव है, जो लगभग पंद्रह दिनों तक चलता है। इस अवधि में धार्मिक अनुष्ठान, पारिवारिक आयोजन, विशेष खान-पान और सामुदायिक मेल-मिलाप सम्मिलित होते हैं।

तिथि और पौराणिक मान्यताएँ

हेरथ फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है। पौराणिक मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव का विवाह माता पार्वती (सती) के साथ संपन्न हुआ था। यह विवाह केवल एक दिव्य मिलन नहीं, बल्कि पुरुष और प्रकृति, चेतना और ऊर्जा, शिव और शक्ति के अद्वैत स्वरूप का प्रतीक है।

एक अन्य मान्यता के अनुसार, इसी दिन भगवान शिव ने ‘ज्वालालिंग’ के रूप में स्वयं को प्रकट किया था। यह प्रकट होना सृष्टि के मूल तत्व—चेतना की अग्नि—का प्रतीक माना जाता है। इस प्रकार हेरथ केवल विवाह-उत्सव नहीं, बल्कि दिव्य प्रकाश के अवतरण और आध्यात्मिक जागरण का पर्व भी है।

कश्मीरी शैव दर्शन और ‘त्रिका’ परंपरा

हेरथ का धार्मिक और दार्शनिक आधार कश्मीरी शैव मत की ‘त्रिका’ परंपरा में निहित है। त्रिका दर्शन कश्मीरी शैव मत की प्रमुख शाखा है, जो अद्वैतवाद (Monism) पर बल देती है। इस दर्शन के अनुसार शिव और शक्ति दो अलग सत्ता नहीं, बल्कि एक ही परम चेतना के दो आयाम हैं। संसार उसी एक अद्वैत तत्व की अभिव्यक्ति है।

त्रिका दर्शन में चेतना के चार स्तर माने गए हैं—जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय। हेरथ में प्रयुक्त अखरोट के चार भाग इन चार अवस्थाओं का प्रतीक माने जाते हैं। इस प्रकार हेरथ का प्रत्येक अनुष्ठान केवल बाह्य कर्मकांड नहीं, बल्कि गहन दार्शनिक अर्थों से जुड़ा है।

कश्मीरी शैव मत में शिव को केवल संहारक देवता नहीं, बल्कि परम चैतन्य का प्रतीक माना गया है। हेरथ के माध्यम से यह विचार पुष्ट होता है कि संपूर्ण सृष्टि उसी चेतना का विस्तार है, और प्रत्येक जीव उसी परम तत्व का अंश है।

वटुक नाथ की पूजा: ज्ञान और अनुशासन का प्रतीक

हेरथ पूजा में ‘वटुक नाथ’ की आराधना मुख्य होती है। ‘वटुक’ शब्द का अर्थ है ‘ब्रह्मचारी’—जो ज्ञान, अनुशासन और आध्यात्मिक साधना का प्रतीक है। वटुक नाथ को भगवान शिव का एक विशेष स्वरूप माना जाता है, जो साधना और संयम का प्रतिनिधित्व करता है।

कश्मीरी पंडित परिवारों में हेरथ के अवसर पर घर के एक विशेष स्थान को पवित्र किया जाता है, जहाँ मिट्टी या तांबे के कलश स्थापित किए जाते हैं। इन्हें ‘वटुक गद’ कहा जाता है। इन कलशों को पुष्प, चावल, सिंदूर और अन्य पूजन सामग्री से सजाया जाता है। कलश में जल भरकर उसमें अखरोट रखे जाते हैं।

यह स्थापना केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि ब्रह्मांड की रचना और चेतना के केंद्र का प्रतिनिधित्व करती है। कलश को शिव-शक्ति के मिलन और सृष्टि के बीज का रूप माना जाता है।

अखरोट का महत्व: प्रतीक और प्रसाद

हेरथ में अखरोट का विशेष महत्व है। इसे प्रसाद के रूप में अनिवार्य माना जाता है। अखरोट को जल से भरे कलशों में रखा जाता है। अखरोट के चार खंड चार वेदों या चेतना के चार स्तरों—जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय—का प्रतिनिधित्व करते हैं।

अखरोट का कठोर बाहरी आवरण और भीतर का कोमल भाग यह दर्शाता है कि बाह्य जगत भले ही कठोर प्रतीत हो, परंतु उसके भीतर दिव्य चेतना विद्यमान है। जल में रखे अखरोट जीवन के मूल तत्व—जल और चेतना—के समन्वय का प्रतीक हैं।

हेरथ के बाद इन अखरोटों को प्रसाद स्वरूप परिवार और समुदाय में वितरित किया जाता है। यह बाँटना केवल प्रसाद का वितरण नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा और शुभकामनाओं का आदान-प्रदान है।

शंकराचार्य मंदिर: आस्था का केंद्र

श्रीनगर स्थित शंकराचार्य मंदिर हेरथ उत्सव का प्रमुख केंद्र माना जाता है। यह प्राचीन मंदिर एक ऊँची पहाड़ी पर स्थित है और भगवान शिव को समर्पित है। हेरथ के अवसर पर यहाँ विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक आयोजन होते हैं।

मंदिर का ऐतिहासिक महत्व भी अत्यंत गहरा है। यह स्थान कश्मीर की आध्यात्मिक परंपरा का प्रतीक है और सदियों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहा है। हेरथ के दिन यहाँ श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ होती है, जो सामूहिक भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्वितीय वातावरण निर्मित करती है।

पंद्रह दिवसीय उत्सव की विस्तृत परंपराएँ

हेरथ केवल एक दिन का पर्व नहीं, बल्कि लगभग पंद्रह दिनों तक चलने वाला विस्तृत आयोजन है। इसकी प्रमुख परंपराएँ निम्नलिखित हैं:

1. वटुक पूजा

हेरथ के मुख्य दिन वटुक गद की स्थापना की जाती है। परिवार के सभी सदस्य मिलकर पूजा में भाग लेते हैं। मंत्रोच्चार, दीप प्रज्वलन और नैवेद्य अर्पण के साथ भगवान शिव की आराधना की जाती है।

2. पारिवारिक सहभागिता

यह पर्व परिवार को एक साथ जोड़ने का अवसर प्रदान करता है। घर के बुजुर्ग पूजा की विधियाँ समझाते हैं, जबकि युवा पीढ़ी परंपराओं को सीखती और आगे बढ़ाती है।

3. विशेष भोजन

कश्मीरी पंडित समुदाय में हेरथ के दौरान विशेष प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं। उल्लेखनीय है कि जहाँ भारत के अधिकांश भागों में शिवरात्रि शाकाहारी व्रत का पर्व है, वहीं कश्मीरी पंडितों में इस अवसर पर मांसाहार—विशेषकर मछली—पकाने की परंपरा रही है। यह परंपरा स्थानीय सांस्कृतिक संदर्भों और ऐतिहासिक जीवनशैली से जुड़ी है।

‘सलाम’: सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक

हेरथ के अगले दिन, जो अमावस्या होती है, उसे ‘सलाम’ कहा जाता है। इस दिन मुस्लिम पड़ोसी अपने हिंदू मित्रों और परिचितों के घर जाकर ‘हेरथ पोश्ते’ कहकर शुभकामनाएँ देते हैं। यह परंपरा कश्मीर की गंगा-जमुनी तहजीब और सांप्रदायिक सौहार्द का जीवंत उदाहरण है।

‘सलाम’ केवल अभिवादन नहीं, बल्कि सदियों से चले आ रहे सामाजिक सामंजस्य का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि कश्मीर की सांस्कृतिक पहचान विविधता में एकता पर आधारित रही है।

विस्थापन और सांस्कृतिक निरंतरता

1990 के दशक में कश्मीर घाटी में उत्पन्न परिस्थितियों के कारण बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों को अपने पैतृक घर छोड़ने पड़े। यह विस्थापन केवल भौगोलिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक और भावनात्मक आघात भी था।

किन्तु इस कठिन समय में ‘हेरथ’ ने समुदाय को अपनी जड़ों से जोड़े रखने का सशक्त माध्यम प्रदान किया। देश-विदेश में बसे कश्मीरी पंडित परिवारों ने जहाँ भी संभव हुआ, इस पर्व को उसी श्रद्धा और विधि से मनाया। छोटे-छोटे घरों, अस्थायी शिविरों और महानगरों के फ्लैटों में भी वटुक गद स्थापित किए गए, अखरोट जल में रखे गए, और “हेरथ पोश्ते” की शुभकामनाएँ गूँजीं।

इस प्रकार हेरथ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्तित्व की घोषणा बन गया—यह संदेश कि परिस्थितियाँ चाहे कैसी भी हों, परंपरा जीवित रहेगी।

सामाजिक और मनोवैज्ञानिक महत्व

हेरथ समुदाय के लिए आत्मबल और सामूहिक पहचान का स्रोत है। यह पर्व:

  • पारिवारिक एकता को सुदृढ़ करता है
  • नई पीढ़ी को सांस्कृतिक शिक्षा देता है
  • विस्थापन की पीड़ा को कम करने में सहायक होता है
  • आध्यात्मिक संतुलन और मानसिक शांति प्रदान करता है

यह उत्सव यह भी स्मरण कराता है कि आध्यात्मिक परंपराएँ केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि घरों और हृदयों में भी जीवित रहती हैं।

आधुनिक संदर्भ में हेरथ

आज जब कश्मीरी पंडित समुदाय भारत और विश्व के विभिन्न भागों में फैला हुआ है, हेरथ एक वैश्विक उत्सव का रूप ले चुका है। डिजिटल माध्यमों से परिवार जुड़ते हैं, ऑनलाइन सत्संग आयोजित होते हैं, और सोशल मीडिया पर “हेरथ पोश्ते” की शुभकामनाएँ साझा की जाती हैं।

प्रधानमंत्री द्वारा सार्वजनिक रूप से हेरथ की शुभकामना देना इस बात का संकेत है कि यह पर्व राष्ट्रीय चेतना में भी सम्मानित स्थान रखता है। यह सांस्कृतिक विविधता और आध्यात्मिक परंपरा के संरक्षण की दिशा में सकारात्मक संदेश देता है।

निष्कर्ष

कश्मीरी पंडित समुदाय का ‘हेरथ’ महोत्सव केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक धरोहर है। यह शिव-शक्ति के अद्वैत दर्शन, पारिवारिक एकता, सामुदायिक सौहार्द और सांस्कृतिक निरंतरता का अद्वितीय संगम है।

वटुक नाथ की पूजा, अखरोट का प्रतीकात्मक महत्व, शंकराचार्य मंदिर की आस्था, ‘सलाम’ की परंपरा और विस्थापन के बावजूद अडिग सांस्कृतिक चेतना—ये सभी तत्व मिलकर हेरथ को एक विशिष्ट और गहन अर्थ प्रदान करते हैं।

आज भी जब “हेरथ पोश्ते” की शुभकामना दी जाती है, तो उसमें केवल त्योहार की बधाई नहीं, बल्कि इतिहास, दर्शन, आस्था और आत्मसम्मान की पूरी परंपरा समाहित होती है। यही कारण है कि हेरथ कश्मीरी पंडित समुदाय की आत्मा का उत्सव है—एक ऐसा उत्सव जो समय की सीमाओं से परे जाकर सदैव जीवंत रहेगा।


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