हिंदी साहित्य का भक्तिकाल भारतीय साहित्य के इतिहास में आध्यात्मिक चेतना, लोकभाषा की प्रतिष्ठा और मानवीय संवेदनाओं के उत्कर्ष का स्वर्णयुग माना जाता है। इस काल में भक्ति को दो प्रमुख धाराओं—निर्गुण और सगुण—में विभाजित किया गया। सगुण भक्ति धारा के अंतर्गत रामभक्ति और कृष्णभक्ति की परंपरा विकसित हुई। कृष्णभक्ति शाखा में जिन कवियों ने भक्ति, प्रेम, माधुर्य और वात्सल्य को अद्वितीय ऊँचाइयों तक पहुँचाया, उनमें कवि सूरदास का स्थान सर्वोपरि है।
सूरदास को यूँ ही “हिंदी साहित्य का सूर्य” नहीं कहा गया। जिस प्रकार सूर्य अपने प्रकाश से सम्पूर्ण जगत को आलोकित करता है, उसी प्रकार सूरदास की काव्य प्रतिभा ने संपूर्ण हिंदी साहित्य को प्रकाशमान किया। उन्होंने कृष्ण को केवल आराध्य देवता के रूप में नहीं, बल्कि जन-जन के हृदय में बसने वाले सजीव, सुलभ और प्रेममय व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत किया। उनकी भक्ति में दर्शन की गहराई है, तो भावनाओं की सहज सरसता भी।
सूरदास और कृष्णभक्ति परंपरा
भक्तिकाल की सगुण धारा में कृष्णभक्ति को जो लोकप्रियता और कलात्मक परिपूर्णता सूरदास के काव्य से प्राप्त हुई, वह अन्यत्र दुर्लभ है। सूरदास ने श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं, किशोरावस्था के रास-विलास, गोपियों के प्रेम, विरह और मान-मनुहार को अत्यंत मार्मिक एवं हृदयस्पर्शी रूप में चित्रित किया।
कृष्णभक्ति की जो धारा सूरदास ने प्रवाहित की, उसने सामान्य जन के हृदय में माधुर्य, करुणा और प्रेम का संचार किया। यही कारण है कि वे वात्सल्य और शृंगार रस के सम्राट कहे जाते हैं। उनके पदों में माँ यशोदा का वात्सल्य, गोपियों का अनन्य प्रेम, राधा का विरह और कृष्ण की चंचल बाल लीलाएँ सजीव हो उठती हैं।
सूरदास की महानता पर कवियों की दृष्टि
सूरदास की काव्य महानता को स्पष्ट करने के लिए हिंदी साहित्य में अनेक उक्ति-कथन प्रचलित हैं। इनमें सबसे प्रसिद्ध यह उक्ति है—
सूर-सूर तुलसी ससी, उड़गन केसवदास।
अब के कवि खद्योत सम, जहाँ-तहाँ करत प्रकास॥
इस उक्ति का भावार्थ यह है कि यदि सूरदास हिंदी साहित्य गगन के सूर्य हैं, तो तुलसीदास चंद्रमा और केशवदास तारे के समान हैं। इनके अतिरिक्त अन्य कवि जुगनुओं की भाँति कभी-कभी ही प्रकाश देते हैं। यह उक्ति सूरदास की श्रेष्ठता और केंद्रीय स्थान को स्पष्ट रूप से रेखांकित करती है।
कवि सूरदास : संक्षिप्त जीवन-परिचय (सारणी)
| शीर्षक / हेडिंग | विवरण |
|---|---|
| पूरा नाम | संत सूरदास |
| जन्म | संवत् 1534 (लगभग 1478 ई.) — रुनकता (आगरा–मथुरा मार्ग); कुछ विद्वानों के अनुसार 1483 ई. — सिही (सीही), बृज क्षेत्र |
| मृत्यु | सन् 1583 ई. (संवत् 1640) के आसपास — परसौली (मथुरा के निकट, बृज क्षेत्र); साहित्यिक परंपरा के अनुसार |
| आयु | लगभग 100 वर्ष |
| पिता | जामुनदास |
| माता | रामदास बैरागी |
| कार्य-क्षेत्र | बृज प्रदेश |
| दर्शन / विचारधारा | भक्ति दर्शन (कृष्णभक्ति) |
| भक्ति परंपरा | सगुण भक्ति धारा (कृष्णभक्ति शाखा) |
| सम्प्रदाय | पुष्टिमार्ग |
| गुरु | महाप्रभु वल्लभाचार्य |
| अष्टछाप से संबंध | अष्टछाप के प्रमुख कवि |
| मुख्य रस | वात्सल्य रस एवं शृंगार रस |
| भाषा | ब्रजभाषा |
| प्रसिद्धि का कारण | भक्तिकाल में कृष्णभक्ति को जन-जन तक पहुँचाना, वात्सल्य व माधुर्य का अद्वितीय चित्रण |
| भक्ति आंदोलन में योगदान | भक्ति आंदोलन एवं संत मत (Sant Mat) को गहराई से प्रभावित किया |
| प्रमुख कृतियाँ | 1. सूरसागर 2. सूरसारावली 3. साहित्य लहरी |
| साहित्यिक महत्त्व | ब्रजभाषा के सर्वश्रेष्ठ कवि, कृष्ण की बाल लीलाओं और गोपियों के प्रेम-विरह के अप्रतिम चित्रकार |
| उपाधि | वात्सल्य और शृंगार रस के सम्राट, हिंदी साहित्य के सूर्य |
सूरदास भक्तिकाल के ऐसे महान कवि हैं जिन्होंने कृष्णभक्ति को भाव, माधुर्य और लोकभाषा के माध्यम से जनसामान्य के हृदय में स्थापित किया। उनकी रचनाएँ भक्ति आंदोलन की आत्मा मानी जाती हैं और हिंदी साहित्य में उनका स्थान अद्वितीय एवं अमर है।
कवि सूरदास का जीवन-परिचय
जन्म और प्रारंभिक जीवन
कवि सूरदास के जन्म के संबंध में प्रामाणिक और सर्वमान्य ऐतिहासिक साक्ष्यों का अभाव है। इस कारण उनके जन्म-स्थान और जन्म-वर्ष को लेकर विद्वानों में मतभेद पाए जाते हैं। सामान्यतः यह माना जाता है कि सूरदास का जन्म संवत् 1534 (लगभग 1478 ई.) के आसपास आगरा–मथुरा मार्ग पर स्थित रुनकता ग्राम में हुआ था। अनेक साहित्येतिहासकार इसी मत को अधिक स्वीकार्य मानते हैं।
वहीं कुछ विद्वानों का मत है कि सूरदास का जन्म सन् 1483 ई. में बृज क्षेत्र के सिही (सीही) नामक ग्राम में हुआ था तथा वे एक सारस्वत (ब्राह्मण) परिवार से संबंधित थे। इस मत के अनुसार उनके पिता का संबंध ब्रह्मभट्ट या राव परंपरा से जोड़ा जाता है।
यद्यपि जन्म-स्थान, जाति और पारिवारिक पृष्ठभूमि को लेकर मतैक्य नहीं है, तथापि यह तथ्य निर्विवाद है कि सूरदास का संपूर्ण जीवन भक्ति, साधना और काव्य-सृजन को समर्पित रहा। उन्होंने सांसारिक यश या ऐश्वर्य के स्थान पर कृष्णभक्ति को ही जीवन का लक्ष्य बनाया और अपनी विलक्षण काव्य-प्रतिभा के माध्यम से भक्ति आंदोलन को गहन एवं व्यापक स्वरूप प्रदान किया।
अंधत्व संबंधी विवाद
सूरदास के नेत्रहीन होने को लेकर भी पर्याप्त विवाद है। कुछ विद्वान उन्हें जन्मांध मानते हैं, जबकि कुछ का मत है कि उनकी काव्य रचनाओं में वर्णित रंग, रूप, सौंदर्य और सूक्ष्म दृश्य-वर्णन यह संकेत देते हैं कि वे जन्मांध नहीं थे। संभव है कि जीवन के किसी चरण में उन्होंने दृष्टि खो दी हो। किंतु यह तथ्य निर्विवाद है कि उनकी आंतरिक दृष्टि अत्यंत प्रखर थी।
वल्लभाचार्य से दीक्षा
सूरदास का जीवन उस समय निर्णायक मोड़ पर पहुँचा जब उनका संपर्क महाप्रभु वल्लभाचार्य से हुआ। वल्लभाचार्य ने उन्हें पुष्टिमार्ग में दीक्षा प्रदान की। पुष्टिमार्ग के अनुसार ईश्वर की भक्ति प्रेम और अनुग्रह से प्राप्त होती है, न कि कठोर तपस्या से। इस दर्शन का गहरा प्रभाव सूरदास के काव्य में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
वल्लभाचार्य ने सूरदास को गोवर्धन स्थित श्रीनाथ जी के मंदिर में कीर्तन सेवा के लिए नियुक्त किया। यहाँ सूरदास प्रतिदिन नए-नए पदों की रचना करते और उन्हें इकतारे पर गाकर भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति करते थे।
निवास और मृत्यु
कवि सूरदास का प्रमुख निवास-स्थल मथुरा का गऊघाट माना जाता है। यहीं रहकर वे प्रारंभ में विनय के पदों की रचना करते थे। महाप्रभु वल्लभाचार्य के संपर्क में आने के पश्चात् उनके काव्य में निर्णायक परिवर्तन आया और उनकी रचनाएँ पूर्णतः श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं, रास और गोपियों के प्रेम-विरह के वर्णन से अनुप्राणित हो गईं। इस प्रकार उनका संपूर्ण साहित्य कृष्णलीला-प्रधान बन गया।
सूरदास की मृत्यु के संबंध में अधिकांश हिंदी साहित्येतिहासकारों का मत है कि उनका देहावसान संवत् 1640 (लगभग 1583 ई.) के आसपास मथुरा के निकट स्थित परसौली (पारसौली / पारसोली) ग्राम में हुआ। यह स्थान बृज क्षेत्र में स्थित माना जाता है और साहित्यिक परंपरा में यही मत सर्वाधिक स्वीकार्य है। यद्यपि कुछ ग्रंथों में मृत्यु-स्थान का स्पष्ट और प्रमाणिक उल्लेख नहीं मिलता, फिर भी उपलब्ध साहित्यिक साक्ष्यों और परंपरागत मान्यताओं के आधार पर परसौली को ही सूरदास का मृत्यु-स्थान मानक रूप में स्वीकार किया गया है।
अष्टछाप और सूरदास
वल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ (गुसाईं जी) ने पुष्टिमार्ग के आठ प्रमुख कवियों को संगठित कर ‘अष्टछाप’ की स्थापना की। इन आठ कवियों में सूरदास का स्थान सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। अष्टछाप के कवियों का उद्देश्य था—भक्ति को संगीत, पद और लोकभाषा के माध्यम से जनसामान्य तक पहुँचाना।
सूरदास की प्रमुख कृतियाँ
सूरदास के नाम से तीन प्रमुख ग्रंथ प्रचलित हैं—
- सूरसागर
- सूरसारावली
- साहित्य लहरी
इन ग्रंथों के माध्यम से सूरदास ने भक्ति, प्रेम, दर्शन, काव्यशास्त्र और लोकजीवन—सभी को समृद्ध किया।
सूरसागर : भक्ति और माधुर्य का महासागर
सूरसागर सूरदास की सर्वाधिक प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण कृति है। इसका आधार मुख्यतः श्रीमद्भागवत पुराण है। इसमें श्रीकृष्ण की बाल लीला से लेकर रासलीला, गोपियों का प्रेम, उद्धव-गोपी संवाद और विरह की मार्मिक अभिव्यक्ति मिलती है।
कहा जाता है कि सूरसागर में मूलतः सवा लाख पद थे, किंतु आज लगभग 10,000 पद ही उपलब्ध हैं। फिर भी उपलब्ध पद ही सूरदास की महानता सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं।
भ्रमरगीत
सूरसागर का सर्वाधिक मर्मस्पर्शी अंश ‘भ्रमरगीत’ है। इसमें गोपियाँ उद्धव के माध्यम से श्रीकृष्ण को संदेश भेजती हैं। गोपियों की वाक्-पटुता, व्यंग्य, प्रेम और विरह का ऐसा सजीव चित्रण हिंदी साहित्य में अन्यत्र दुर्लभ है।
गेयता और लोकप्रभाव
सूरसागर के पद अत्यंत गेय हैं। इन्हें विभिन्न राग-रागनियों में गाया जाता है। यही कारण है कि सूरदास का काव्य केवल पाठ्य नहीं, बल्कि गायन-परंपरा का अभिन्न अंग बन गया।
सूरसारावली
सूरसारावली को लेकर विद्वानों में मतभेद रहे हैं, फिर भी भाषा, शैली और भाव की दृष्टि से इसे सूरदास की प्रामाणिक रचना माना जाता है। इसमें 1107 छंद हैं। इस ग्रंथ में सृष्टि, भक्ति और दर्शन से संबंधित विषयों का समन्वय मिलता है।
साहित्य लहरी
साहित्य लहरी में सूरदास के 118 दृष्टकूट पद संकलित हैं। इस ग्रंथ में रीतिशास्त्रीय तत्वों—जैसे नायिका भेद, अलंकार निरूपण—का विवेचन मिलता है। साथ ही कहीं-कहीं श्रीकृष्ण की बाल लीलाएँ और महाभारत के प्रसंग भी वर्णित हैं। इससे सिद्ध होता है कि सूरदास केवल भक्त कवि ही नहीं, बल्कि कुशल साहित्यकार और काव्यशास्त्री भी थे।
सूरदास द्वारा रचित प्रमुख हिन्दी ग्रंथ (तालिका)
| क्रम संख्या | ग्रंथ का नाम | ग्रंथ का प्रकार / विषय | संक्षिप्त विवरण |
|---|---|---|---|
| 1. | सूरसागर | कृष्णभक्ति काव्य (पद संग्रह) | सूरदास की सर्वाधिक प्रसिद्ध और महत्त्वपूर्ण रचना। इसमें मूलतः लगभग सवा लाख पद बताए जाते हैं, परन्तु वर्तमान में लगभग 7–8 हजार पद ही उपलब्ध हैं। इसमें श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं, वात्सल्य और माधुर्य भाव का अनुपम चित्रण है। |
| 2. | सूरसरावली (सूर की सारावली) | दार्शनिक एवं भक्ति काव्य | इसमें सृष्टि-उत्पत्ति, जीव, ईश्वर और भक्ति से संबंधित दार्शनिक विचार व्यक्त हुए हैं। यह ग्रंथ पुष्टिमार्गीय दर्शन से जुड़ा माना जाता है। |
| 3. | साहित्य-लहरी | कूट पदों का संग्रह | इस ग्रंथ में सूरदास के कूट पद संकलित हैं। उपलब्ध प्रति में अनेक प्रक्षिप्तांश पाए जाते हैं, फिर भी साहित्यिक दृष्टि से यह एक महत्त्वपूर्ण रचना मानी जाती है। |
| 4. | नल-दमयन्ती | आख्यान काव्य | महाभारत की प्रसिद्ध नल-दमयन्ती कथा पर आधारित काव्य। इसमें कथा-रस और काव्यात्मकता का सुंदर समन्वय मिलता है। |
| 5. | ब्याहलो | संस्कार-प्रधान काव्य | यह ग्रंथ विवाह-संस्कार और उससे जुड़े सामाजिक-धार्मिक प्रसंगों का काव्यात्मक चित्रण प्रस्तुत करता है। |
अन्य उल्लेखित ग्रंथ
नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित हस्तलिखित ग्रंथ-सूचियों में सूरदास के लगभग 16 ग्रंथों का उल्लेख मिलता है। इनमें उपर्युक्त ग्रंथों के अतिरिक्त दशमस्कंध टीका, नागलीला, भागवत्, गोवर्धन लीला, सूरपचीसी, सूरसागर सार, प्राणप्यारी आदि के नाम सम्मिलित हैं। तथापि साहित्यिक एवं प्रामाणिक दृष्टि से सूरसागर, सूरसरावली और साहित्य-लहरी को ही सूरदास की प्रमुख एवं महत्त्वपूर्ण रचनाएँ माना जाता है।
श्रीकृष्ण की बाल-छवि, वात्सल्य और सखा भाव का जैसा अनुपम चित्रण इन ग्रंथों में मिलता है, वह हिन्दी साहित्य में सूरदास को एक विशिष्ट और अमर स्थान प्रदान करता है।
भाषा और शैली
सूरदास की भाषा ब्रजभाषा है, जिसे उन्होंने पूर्ण गरिमा और माधुर्य प्रदान किया। उनकी ब्रजभाषा इतनी सहज, स्वाभाविक और सरस है कि बाद में कोई भी कवि उस स्तर तक नहीं पहुँच सका। उनकी शैली में—
- भावों की स्वाभाविकता
- उपमा और रूपक की सरलता
- लोकजीवन की सजीव झलक
- संगीतात्मकता
स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
रस-निरूपण
सूरदास मुख्यतः शृंगार और वात्सल्य रस के कवि हैं। बालकृष्ण की चेष्टाओं का जैसा वात्सल्यपूर्ण वर्णन सूरदास ने किया है, वैसा हिंदी साहित्य में अन्यत्र दुर्लभ है। इसके अतिरिक्त करुण और शांत रस की भी झलक मिलती है।
निष्कर्ष
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि सूरदास न केवल कृष्णभक्ति परंपरा के शीर्षस्थ कवि हैं, बल्कि संपूर्ण हिंदी साहित्य के महानतम कवियों में से एक हैं। उनकी विषयवस्तु में मौलिकता, शैली में प्रौढ़ता और भाषा में अपूर्व माधुर्य है। उनका संपूर्ण काव्य गेय, लोकग्राह्य और भावप्रवण है।
इसी कारण किसी कवि ने उनके विषय में कहा है—
“तत्त्व-तत्त्व सूरा कही, और सब जूठी।”
अर्थात् वास्तविक सत्य और सार तो सूरदास ने ही कहा है, शेष कवियों की रचनाएँ उसके सामने गौण प्रतीत होती हैं। सूरदास वास्तव में भक्ति, प्रेम और काव्य के ऐसे सूर्य हैं, जिनका प्रकाश युगों-युगों तक हिंदी साहित्य को आलोकित करता रहेगा।
- सूरदास के काव्य में वात्सल्य रस की प्रधानता पर प्रकाश डालते हुए उपयुक्त उदाहरण प्रस्तुत कीजिए।
- बाल-कृष्ण के सौंदर्य, चेष्टाओं और स्वभाव का चित्रण सूरदास ने किस प्रकार किया है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
- यशोदा-कृष्ण संबंध के माध्यम से वात्सल्य रस की अभिव्यक्ति सूरदास के काव्य में कैसे हुई है? सोदाहरण विवेचन कीजिए।
- सूरदास के वात्सल्य वर्णन की विशेषताओं पर सोदाहरण प्रकाश डालिए।
- ‘सूरदास वात्सल्य रस के सम्राट है’ इस कथन की पुष्टि उदाहरण सहित कीजिए।
- ‘सुर ने कृष्ण की बाल लीलाओं के सुन्दर चित्र अंकित किए हैं।’ इस कथन की सार्थकता उदाहरणो के आधार पर सिद्ध कीजिए।
- ‘बाल सौन्दर्य एवं बाल स्वभाव के चित्रण में जो सफलता सूरदास को मिली है, उतनी अन्य किसी का नहीं’ सोदाहरण सिद्ध कीजिए।
सूरदास के वात्सल्य वर्णन की विशेषताएँ
हिंदी भक्तिकाल के श्रेष्ठ कवियों में महाकवि सूरदास का स्थान अत्यंत ऊँचा है। वे पुष्टिमार्गीय कृष्ण-भक्ति के अनन्य साधक तथा ब्रजभाषा के अप्रतिम कवि माने जाते हैं। सूरदास के काव्य का केंद्रीय आधार श्रीकृष्ण का जीवन है, जिसमें विशेषतः बालकृष्ण की लीलाओं, उनके सौंदर्य, स्वभाव और माता यशोदा के वात्सल्य भाव का अनुपम चित्रण मिलता है। साहित्यालोचकों ने सर्वसम्मति से स्वीकार किया है कि वात्सल्य रस की जैसी सजीव, मार्मिक और मनोवैज्ञानिक प्रस्तुति सूरदास के यहाँ मिलती है, वैसी अन्य किसी कवि के यहाँ दुर्लभ है। इसीलिए उन्हें ‘वात्सल्य रस का सम्राट’ कहा गया है।
सूरदास का काव्य केवल भक्ति की अनुभूति तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें मानवीय भावनाओं की सूक्ष्म परख, बाल मनोविज्ञान की गहरी समझ और मातृ-हृदय की करुणा का यथार्थ चित्रण भी मिलता है। उनके पदों में बालक की चेष्टाएँ, उसकी जिद, उसका कौतुक, उसका क्रोध, उसकी भोली तर्कशीलता तथा माता की ममता, आशंका, स्नेह और व्याकुलता अत्यंत स्वाभाविक रूप में प्रकट होती हैं। इसी कारण सूरदास का वात्सल्य वर्णन पाठक के हृदय को सीधे स्पर्श करता है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने सूरदास की इस विशेषता को रेखांकित करते हुए लिखा है—“बाल सौंदर्य और स्वभाव के चित्रण में जितनी सफलता सूर को मिली है, उतनी अन्य किसी को नहीं। वे अपनी बंद आँखों से वात्सल्य का कोना-कोना झाँक आए हैं।” यह कथन सूरदास के वात्सल्य रस की महत्ता को प्रमाणित करता है।
सूरदास के वात्सल्य वर्णन की विशेषताओं को समझने के लिए उनके काव्य में उपलब्ध विभिन्न प्रसंगों का क्रमबद्ध अध्ययन आवश्यक है। निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत सूरदास के वात्सल्य रस का विवेचन किया जा सकता है।
कृष्ण के बाल रूप की मनोहर झाँकी
सूरदास ने श्रीकृष्ण के बाल रूप का ऐसा सजीव और आकर्षक चित्र खींचा है कि पाठक की आँखों के सामने मानो साक्षात बालकृष्ण उपस्थित हो जाते हैं। उनके वर्णन में कृष्ण का रूप अत्यंत सरल, स्वाभाविक और मनोहर है। धूल से सने केश, घुटनों के बल रेंगते हुए कदम, तोतली वाणी में मधुर शब्द और चंचल नेत्र—इन सबका संयोजन बाल सौंदर्य की पूर्णता को प्रकट करता है।
माता यशोदा अपने लाल की इस छवि पर बलिहारी जाती हैं। सूरदास कहते हैं—
“हौं बलि जाऊँ छबीले लाल की। धूसर धूरि घुटुरुवन रेगनि, बोलन वचन रसाल की।”
इन पंक्तियों में बालकृष्ण की सहज चेष्टाओं और उनकी मधुर वाणी का ऐसा चित्र है, जिसमें कोई कृत्रिमता नहीं। धूल में सने बालक का सौंदर्य यहाँ अलौकिक बन जाता है। माता का वात्सल्य इस सौंदर्य को और अधिक उज्ज्वल कर देता है।
बाल स्वभाव और बाल वृत्तियों का सजीव चित्रण
सूरदास केवल बालकृष्ण के रूप-सौंदर्य तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उनके स्वभाव और मानसिक वृत्तियों का भी सूक्ष्म चित्रण करते हैं। बालक की स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ—स्पर्धा, जिज्ञासा, कौतुक और आत्मगौरव—सूर के पदों में अत्यंत यथार्थ रूप में व्यक्त हुई हैं।
एक प्रसिद्ध पद में कृष्ण अपनी माता से शिकायत करते हैं कि उनकी चोटी कब बढ़ेगी। उन्हें लगता है कि बड़े भाई बलराम की चोटी उनसे बड़ी है। माता यशोदा उन्हें समझाती हैं कि दूध पीने से चोटी बढ़ेगी। कृष्ण भोलेपन से दूध पीते हैं, चोटी पकड़कर देखते हैं, पर जब वह नहीं बढ़ती तो निराश होकर कहते हैं—
“मैया कबहि बढ़ेगी चोटी। किती बार मोहि दूध पिबत भई, यह अजहूँ है छोटी।”
यह दृश्य बाल मनोविज्ञान का अत्यंत सुंदर उदाहरण है। बालक की सरल सोच, तर्क और अपेक्षा यहाँ पूरी स्वाभाविकता के साथ सामने आती है।
बाल आक्रोश और आत्मसम्मान की अभिव्यक्ति
बालक का क्रोध भी उसके स्वभाव का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। सूरदास ने कृष्ण के बाल आक्रोश का भी सजीव चित्रण किया है। जब ग्वाल-बाल, विशेषकर बलराम, कृष्ण को चिढ़ाते हैं कि वे नंद-यशोदा के पुत्र नहीं हैं, बल्कि उन्हें मोल लिया गया है, तब कृष्ण का बाल-सम्मान आहत हो जाता है। वे खीझकर माता यशोदा से शिकायत करते हैं—
“मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायो। मोसो कहत मोल को लीनो, तू जसुमति कब जायो।”
यहाँ बालकृष्ण का आत्मसम्मान, उनका आक्रोश और माता पर उनका पूर्ण विश्वास स्पष्ट दिखाई देता है। माता यशोदा जब उन्हें स्नेहपूर्वक आश्वस्त करती हैं कि वे ही उनका पुत्र हैं, तब जाकर उनका क्रोध शांत होता है। यह दृश्य मातृ-वात्सल्य और बाल-भावना के सुंदर समन्वय को प्रस्तुत करता है।
मातृ हृदय की कोमलता और आशंका
सूरदास ने माता यशोदा के हृदय की कोमलता, ममता और आशंका का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया है। माता का हृदय सदा अपने पुत्र के प्रति चिंतित रहता है—कहीं उसकी नींद न टूट जाए, कहीं उसे कोई कष्ट न हो। पालने में झुलाते हुए यशोदा कृष्ण को सुलाती हैं और लोरी गाती हैं—
“यशोदा हरि पालने झुलावै। हलरावै, दुलराय मल्हावै, जोइ सोई कछु गावै।”
यहाँ मातृ-हृदय की सहज अभिव्यक्ति है। लोरी में छिपा स्नेह, चिंता और वात्सल्य पाठक के मन को द्रवित कर देता है।
बाल लीलाओं का स्वाभाविक और रसपूर्ण चित्रण
बालकृष्ण की लीलाएँ सूरदास के काव्य का प्राणतत्त्व हैं। खेल-कूद, मित्रों से हँसी-ठिठोली, हार-जीत का उलाहना—इन सबका वर्णन अत्यंत स्वाभाविक है। एक स्थान पर सूर कहते हैं—
“खेलन में को काको गुसैयाँ। हरि हारे जीते श्रीदामा, बरबस की कत करत रिसैयाँ।”
खेल में हार-जीत को लेकर होने वाला तकरार बाल-स्वभाव की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करता है। इसी क्रम में माखन-चोरी की लीला आती है। गोपी जब यशोदा से शिकायत करती है, तब कृष्ण तर्क देते हुए अपनी निर्दोषता सिद्ध करने का प्रयास करते हैं—
“मैया मैं नहिं माखन खायो। मैं बालक बहियन को छोटो, छीको केहि विधि पायो।”
यह बालक की भोली तर्कशीलता का अद्भुत उदाहरण है।
बाल हठ और जिद का सजीव वर्णन
बालक की जिद उसकी सबसे स्वाभाविक प्रवृत्ति है। सूरदास ने कृष्ण की हठ को अत्यंत रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है। कृष्ण चंद्रमा को खिलौना बनाकर माँगते हैं और हठ करते हैं—
“मैया मैं तो चंद खिलौना लैहों। जैहों लोटि अबै धरनी पै, तेरी गोद न ऐहों।”
माता यशोदा की विवशता और बालक की हठ—दोनों का चित्रण यहाँ अत्यंत प्रभावशाली है।
यशोदा की विकलता और विरह-वात्सल्य
जब कृष्ण मथुरा चले जाते हैं, तब यशोदा का वात्सल्य विरह में बदल जाता है। वे देवकी के पास संदेश भेजती हैं—
“संदेसो देवकी सों कहियो। हों तो धाय तिहारे सुत की, कृपा करति ही रहियो।”
यहाँ वात्सल्य का चरम रूप दिखाई देता है, जिसमें माँ अपने पुत्र के सुख के लिए स्वयं को भुला देती है।
उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि सूरदास वात्सल्य रस के सच्चे सम्राट हैं। उन्होंने केवल बालकृष्ण की लीलाओं का ही नहीं, बल्कि बाल मनोविज्ञान, मातृ-हृदय की संवेदनाओं और मानवीय भावनाओं का अत्यंत सूक्ष्म और मार्मिक चित्रण किया है। उनके काव्य में वात्सल्य रस अपनी पूर्ण गरिमा के साथ उपस्थित है। यही कारण है कि हिंदी साहित्य में सूरदास का वात्सल्य वर्णन एक अमूल्य धरोहर के रूप में स्वीकार किया जाता है।
- सूरदास के काव्य में भक्ति तत्वों का विवेचन उदाहरण सहित कीजिए।
- सूरदास की कृष्ण-भक्ति की विशेषताएँ स्पष्ट करते हुए उनकी भक्ति भावना पर प्रकाश डालिए।
- सूरदास की भक्ति सगुण है या निर्गुण? तर्क एवं उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
- भक्ति आंदोलन के संदर्भ में सूरदास का स्थान निर्धारित करते हुए उनकी भक्ति दृष्टि का विश्लेषण कीजिए।
- सूर की भक्ति भावना पर प्रकाश डालिए।
सूरदास की भक्ति भावना
भक्तिकालीन हिन्दी साहित्य में सूरदास का स्थान अत्यन्त गौरवपूर्ण है। वे न केवल कृष्णभक्ति धारा के प्रमुख कवि हैं, बल्कि भक्ति को मानवीय संवेदनाओं, बाल-सुलभ भावनाओं, वात्सल्य, सखा और विनय के विविध रंगों में अभिव्यक्त करने वाले अनुपम साधक भी हैं। सूरदास की भक्ति भावना एकांगी नहीं, बल्कि बहुआयामी है, जिसमें दर्शन, भावना, काव्य और जीवन—चारों का सुन्दर समन्वय दिखाई देता है। उनकी भक्ति पुष्टिमार्गीय है, जो ईश्वर की कृपा, अनुग्रह और पोषण को भक्ति का मूल मानती है। इस लेख में सूरदास की भक्ति भावना का क्रमबद्ध और विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया जा रहा है।
भक्तिकाल में सूरदास का स्थान
हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल को सामान्यतः दो प्रमुख धाराओं में विभाजित किया जाता है—निर्गुण भक्ति और सगुण भक्ति। निर्गुण भक्ति में कबीर, रैदास जैसे संत आते हैं, जबकि सगुण भक्ति में रामभक्ति और कृष्णभक्ति—दो उपधाराएँ मिलती हैं। कृष्णभक्ति धारा के कवियों में सूरदास, नन्ददास, रसखान आदि प्रमुख हैं। इन कवियों में सूरदास सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रभावशाली माने जाते हैं।
सूरदास सगुण भक्ति के उपासक हैं और उनका आराध्य श्रीकृष्ण हैं—बालकृष्ण, ग्वालबाल, माखनचोर, सखा, नटखट और करुणानिधान कृष्ण। उन्होंने कृष्ण के लौकिक और अलौकिक दोनों रूपों का अत्यन्त सजीव चित्रण किया है। उनकी भक्ति केवल दार्शनिक या आध्यात्मिक नहीं, बल्कि हृदय की गहराइयों से निकली हुई भावनात्मक भक्ति है।
पुष्टिमार्गीय भक्ति और वल्लभाचार्य से संबंध
सूरदास की भक्ति का आधार पुष्टिमार्ग है। पुष्टिमार्ग की स्थापना आचार्य वल्लभाचार्य ने की थी। इस मार्ग का मूल सिद्धान्त है—‘पोषणं तदनुग्रहः’, अर्थात् ईश्वर की कृपा ही जीव का पोषण और उद्धार करती है। इस मार्ग में साधना, तपस्या या कठोर नियमों की अपेक्षा भगवान की अनुकम्पा और कृपा पर अधिक बल दिया गया है।
सूरदास वल्लभाचार्य के शिष्य माने जाते हैं और उन्हें पुष्टिमार्ग में दीक्षित कवि माना जाता है। वे अष्टछाप के कवियों में प्रमुख स्थान रखते हैं। पुष्टिमार्गीय भक्ति के कारण सूरदास की रचनाओं में सहजता, माधुर्य, आत्मसमर्पण और ईश्वर की बाल-लीलाओं का अत्यन्त सरस चित्रण मिलता है।
सगुण कृष्ण के उपासक
सूरदास निर्गुण ब्रह्म की अपेक्षा सगुण ईश्वर को अधिक महत्त्व देते हैं। उनका मानना है कि निर्गुण, निराकार ब्रह्म इन्द्रियों की पकड़ से बाहर है। उसकी अनुभूति तो हो सकती है, पर उसका वर्णन या अभिव्यक्ति संभव नहीं। इसलिए वे सगुण, साकार कृष्ण की लीलाओं का गान करते हैं। इस संदर्भ में उनका प्रसिद्ध पद दृष्टव्य है—
अविगत गति कछु कहत न आवै।
ज्यौ गूंगे मीठे फल कौ रस अन्तरगत ही भावै॥
मन बानी की अगम अगोचर निरालंब मन चक्रत धावै॥
सब विधि अगम विचारहि तातै सूर सगुन लीला पद गावै॥
इस पद में सूरदास स्पष्ट करते हैं कि निर्गुण ब्रह्म की स्थिति गूँगे द्वारा मीठे फल के रस के समान है—अनुभव तो होता है, पर कहा नहीं जा सकता। इसलिए वे सगुण ईश्वर की लीलाओं का गायन ही श्रेष्ठ मानते हैं।
विनय भावना
सूरदास की भक्ति में विनय भावना का विशेष स्थान है। उनके ‘विनय के पद’ अत्यन्त मार्मिक हैं। इन पदों में कवि स्वयं को दीन, हीन और असहाय मानकर प्रभु की शरण में जाता है। वह ईश्वर से अपने उद्धार की करुण प्रार्थना करता है।
अब मैं राखि लेहु भगवान।
हौं अनाथ बैठो द्रुम डरियाँ पारिधि साघे बान॥
इस पद में संसार को वृक्ष, जीवात्मा को पक्षी और काल-माया को शिकारी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। जीव चारों ओर से संकटों से घिरा हुआ है—नीचे शिकारी का बाण है, ऊपर बाज मँडरा रहा है। ऐसी स्थिति में केवल भगवान की कृपा ही उसे बचा सकती है। यह विनय भावना सूरदास की भक्ति को अत्यन्त करुण और आत्मीय बना देती है।
सखा भाव की भक्ति
सूरदास की भक्ति का सबसे विशिष्ट पक्ष उनका सखा भाव है। वे कृष्ण को अपना स्वामी या प्रभु मात्र नहीं मानते, बल्कि मित्र के रूप में देखते हैं। इस सखा भाव में आत्मीयता, अपनापन और अधिकार-बोध निहित है।
सूरदास कृष्ण से हँसी-मजाक करते हैं, उनसे तर्क-वितर्क करते हैं, यहाँ तक कि उन्हें उलाहना भी देते हैं—
आजु ही एक-एक करि टरिहौं।
कै तुमहीं कै हमहीं माधौ अपने भरोसे लरिहौं॥
इस प्रकार की भक्ति में भक्त और भगवान के बीच दूरी समाप्त हो जाती है। ईश्वर यहाँ सर्वशक्तिमान, भयकारी सत्ता नहीं, बल्कि अपना सखा, साथी और सहचर बन जाता है। यह सखा भाव भक्ति को सहज, मानवीय और अत्यन्त आकर्षक बनाता है।
आत्मनिवेदन की प्रवृत्ति
सूरदास की भक्ति भावना में आत्मनिवेदन का भाव भी अत्यन्त प्रबल है। वे स्वयं को पापी, पतित और अयोग्य मानते हैं। अपने दोषों को स्वीकार कर वे ईश्वर की शरण में जाते हैं।
प्रभु हौं सब पतितन कौ टीकौ॥
इस पंक्ति में सूरदास स्वयं को ‘पतितों का भी पतित’ कहकर ईश्वर की करुणा को आकर्षित करते हैं। यह आत्मनिवेदन अहंकार के पूर्ण त्याग का प्रतीक है। भक्ति के इस स्तर पर पहुँचकर भक्त स्वयं को पूर्णतः ईश्वर के हाथों सौंप देता है।
कृष्ण के प्रति अनन्यता
सूरदास की भक्ति अनन्य है। वे कृष्ण के अतिरिक्त किसी और को अपना आश्रय नहीं मानते। उनका मन कहीं और सुख नहीं पाता। इस भाव को वे अत्यन्त सुन्दर उपमा द्वारा स्पष्ट करते हैं—
मेरो मन अनत कहां सुख पावै।
जैसे उड़ि जहाज को पंछी फिरि जहाज पै आवै॥
जिस प्रकार जहाज पर बैठा पक्षी उड़कर कहीं और नहीं जा सकता और अन्ततः उसी जहाज पर लौट आता है, उसी प्रकार मन संसार में भटककर भी अन्त में कृष्ण की शरण में ही आता है। यह अनन्यता सूरदास की भक्ति को दृढ़, अटूट और पूर्ण समर्पण वाली बनाती है।
बालकृष्ण और वात्सल्य भाव
यद्यपि प्रश्न में मुख्यतः विनय, सखा और अनन्यता की चर्चा है, फिर भी सूरदास की भक्ति भावना में वात्सल्य भाव को अनदेखा नहीं किया जा सकता। उन्होंने बालकृष्ण की लीलाओं का जो चित्रण किया है, वह हिन्दी साहित्य में अद्वितीय है।
यशोदा का वात्सल्य, कृष्ण की बाल-सुलभ चंचलता, माखनचोरी, रूठना-मनाना—इन सबके माध्यम से सूरदास की भक्ति अत्यन्त सजीव और भावपूर्ण हो उठती है। यह वात्सल्य भाव भी अंततः भक्ति का ही एक रूप है, जिसमें प्रेम, करुणा और अपनापन निहित है।
सूरदास की भक्ति का दार्शनिक आधार
सूरदास की भक्ति केवल भावुकता नहीं है, उसके पीछे एक सुदृढ़ दार्शनिक आधार भी है। पुष्टिमार्गीय दर्शन के अनुसार जीव की मुक्ति ईश्वर की कृपा से ही संभव है। मानव अपने बल पर ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता। यह विचार सूरदास की रचनाओं में बार-बार व्यक्त होता है।
उनकी भक्ति में ज्ञान, कर्म और भक्ति—तीनों का समन्वय दिखाई देता है, किन्तु प्रधानता भक्ति की ही है। यह भक्ति सहज है, सरल है और जनसाधारण के लिए भी ग्राह्य है।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि सूरदास उच्चकोटि के भक्त कवि थे। उनकी भक्ति भावना बहुआयामी, गहन और अत्यन्त मानवीय है। वे सगुण कृष्ण के उपासक हैं और पुष्टिमार्गीय भक्ति के माध्यम से ईश्वर की कृपा और अनुग्रह को सर्वोपरि मानते हैं। उनकी भक्ति में विनय, सखा भाव, आत्मनिवेदन, अनन्यता और वात्सल्य—सभी भावों का सुन्दर समन्वय मिलता है।
सूरदास ने भक्ति को दार्शनिक जटिलताओं से मुक्त कर जनसाधारण के हृदय तक पहुँचाया। इसी कारण वे हिन्दी भक्तिकाव्य में अमर स्थान के अधिकारी हैं और उनकी भक्ति भावना आज भी पाठकों और श्रोताओं को समान रूप से प्रभावित करती है।
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