हिन्दी साहित्य के छायावाद युग में जिन कवियों ने काव्य को दार्शनिक गहराई, भावात्मक ऊँचाई और कलात्मक सौष्ठव प्रदान किया, उनमें जयशंकर प्रसाद का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उनका महाकाव्य कामायनी न केवल छायावादी काव्यधारा का शिखर है, बल्कि भारतीय चिंतन, संस्कृति और मानवीय मनोविज्ञान का अद्भुत काव्य-प्रस्ताव भी है। यह काव्य मानव-जीवन के विभिन्न मनोभावों—श्रद्धा, इड़ा, काम, क्रोध, लज्जा, आशा, स्मृति आदि—का प्रतीकात्मक और दार्शनिक निरूपण करता है।
‘श्रद्धा’ सर्ग का संकलित अंश ‘श्रद्धा-मनु’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है, क्योंकि इसमें श्रद्धा के सौन्दर्य का ऐसा सूक्ष्म, प्रतीकात्मक और भावपूर्ण चित्रण किया गया है जो छायावादी काव्य-शैली की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति है। यहाँ श्रद्धा केवल एक स्त्री-चरित्र नहीं, बल्कि मानव-जीवन में आशा, विश्वास, प्रेम और नव-सृजन की प्रेरणा का सजीव प्रतीक बनकर उभरती है।
संभावित परीक्षा-प्रश्न:
1. कामायनी’ के ‘श्रद्धा’ सर्ग के आधार पर श्रद्धा के रूप-सौन्दर्य का विशद वर्णन कीजिए।
2. ‘श्रद्धा-मनु’ प्रसंग के आधार पर श्रद्धा के सौन्दर्य-चित्रण की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
3. संकलित अंश ‘श्रद्धा-मनु’ के आधार पर श्रद्धा के सौन्दर्य का वर्णन कीजिए।
4. ‘कामायनी’ के ‘श्रद्धा-मनु’ अंश में कवि ने श्रद्धा के सौन्दर्य का चित्रण किस प्रकार किया है? सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
5. कामायनी के संकलित अंश ‘श्रद्धा-मनु’ में श्रद्धा के सौन्दर्य का जो वर्णन किया गया है उसका सोदाहरण विवेचन कीजिए।
6. ‘श्रद्धा-मनु’ सर्ग में श्रद्धा के सौन्दर्य-वर्णन में प्रकृति-चित्रण की भूमिका का विवेचन कीजिए।
‘श्रद्धा-मनु’ प्रसंग की पृष्ठभूमि
हिन्दी साहित्य के छायावाद युग की सर्वश्रेष्ठ कृतियों में जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित कामायनी का महत्वपूर्ण स्थान है। यह महाकाव्य खड़ी बोली में रचित है और इसमें कुल पंद्रह सर्ग हैं। इन सर्गों में मानव-जीवन के विविध मनोभावों और प्रवृत्तियों का प्रतीकात्मक चित्रण किया गया है। इन्हीं में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण सर्ग है—‘श्रद्धा’। इस सर्ग का जो अंश ‘श्रद्धा-मनु’ शीर्षक से संकलित है, वही वर्तमान प्रसंग की पृष्ठभूमि प्रस्तुत करता है।
कामायनी की कथा का आरंभ जल-प्रलय से होता है। यह प्रलय इतना व्यापक और विनाशकारी था कि देव-सृष्टि पूर्णतः नष्ट हो गई। समस्त ऐश्वर्य, वैभव और जीवन-संरचनाएँ जलराशि में विलीन हो गईं। इस महाविनाश के बाद केवल मनु ही जीवित बचे। वे ही मानव-वंश के प्रतिनिधि और भविष्य के सृजन की आशा के रूप में शेष रह गए।
प्रलय के उपरांत चारों ओर नीरवता, शून्यता और विषाद का वातावरण व्याप्त है। प्रकृति भी मानो शोकाकुल है। ऐसी परिस्थिति में मनु एक गुफा के समीप निर्जन स्थान पर तपस्या में लीन हैं। उनका मन गहन चिंतन और एकांत साधना में डूबा हुआ है। वे अतीत की स्मृतियों और वर्तमान की नीरसता के बीच एक प्रकार की मानसिक विरक्ति का अनुभव कर रहे हैं। जीवन में न कोई सहचर है, न कोई संवाद। चारों ओर केवल एकांत और उदासी है।
इसी निस्तब्ध और विषादपूर्ण वातावरण में श्रद्धा का प्रवेश होता है। श्रद्धा गांधार देश की निवासिनी है। वह स्वाभाविक जिज्ञासा और सहज गति से उस निर्जन प्रदेश में घूमती हुई वहाँ पहुँचती है जहाँ मनु तप में लीन बैठे हैं। वह मनु को अकेले और गंभीर मुद्रा में देखकर आश्चर्यचकित होती है तथा उनसे उनका परिचय पूछती है।
मनु जब कुतूहलवश अपनी दृष्टि ऊपर उठाते हैं, तो उनके सामने एक अत्यंत सुकुमार, तेजस्विनी और मोहिनी युवती खड़ी दिखाई देती है। उसका रूप अद्वितीय है, उसकी उपस्थिति वातावरण को परिवर्तित कर देती है। जिस स्थान पर अभी तक केवल नीरवता और निराशा थी, वहाँ अब जीवन और चेतना का संचार होने लगता है।
यहीं से श्रद्धा के सौन्दर्य-वर्णन का आरंभ होता है। कवि ने श्रद्धा के रूप, अंग-प्रत्यंग की कोमलता, उसकी तेजोदीप्ति और उसके व्यक्तित्व के आकर्षण का अत्यंत प्रभावशाली चित्र प्रस्तुत किया है। साथ ही यह भी दिखाया है कि उसके आगमन से मनु के जीवन में कैसी भावात्मक हलचल उत्पन्न होती है।
इस प्रकार ‘श्रद्धा-मनु’ प्रसंग की पृष्ठभूमि में एक ओर प्रलय के बाद का शून्य और निराश वातावरण है, तो दूसरी ओर श्रद्धा के आगमन से उत्पन्न आशा, सौन्दर्य और नव-सृजन की संभावना। यही विरोधाभास इस प्रसंग को अत्यंत मार्मिक और प्रभावपूर्ण बना देता है।
श्रद्धा का समग्र रूप : एक इन्द्रजाल
मनु जब श्रद्धा को देखते हैं, तो उनका प्रथम अनुभव विस्मय का होता है। उन्हें उसका रूप “नयन का इन्द्रजाल” प्रतीत होता है—अर्थात् ऐसा सम्मोहन जो दृष्टि को बाँध ले। कवि ने श्रद्धा के सौन्दर्य को किसी स्थूल, मांसल या भौतिक रूप में नहीं, बल्कि लता, चन्द्रिका, घनश्याम मेघ जैसे प्रकृति-प्रतीकों के माध्यम से चित्रित किया है—
और देखा वह सुन्दर दृश्य,
नयन का इन्द्रजाल अभिराम।
कसम वैभव में लता समान,
चन्द्रिका से लिपटा घनश्याम।।
यहाँ श्रद्धा की तुलना फूलों से लदी लता से की गई है। वह सौम्य, कोमल और सुकुमार है। उसके शरीर पर नील वस्त्र हैं, जो उसकी अंग-कान्ति को और अधिक उभार देते हैं। “चन्द्रिका से लिपटा घनश्याम” उपमा से यह भाव स्पष्ट होता है कि उसके रूप में उज्ज्वलता और गंभीरता का अद्भुत समन्वय है।
नील परिधान और अंग-कान्ति का सौन्दर्य
श्रद्धा का वस्त्र-परिधान भी उसके सौन्दर्य को दार्शनिक अर्थ देता है। वह नील-वस्त्र धारण किए हुए है। नील रंग आकाश और गहराई का प्रतीक है। उसके सुकुमार अंग उन नील वस्त्रों के बीच ऐसे झलकते हैं जैसे मेघों के मध्य बिजली का गुलाबी फूल खिला हो—
नील परिधान बीच सुकुमार,
खुल रहा मृदुल अधखुला अंग।
खिला हो ज्यों बिजली का फूल,
मेघ बन बीच गुलाबी रंग।।
यहाँ कवि ने अत्यंत कलात्मक ढंग से श्रद्धा के अंगों की कोमलता और आभा का चित्रण किया है। ‘बिजली का फूल’ उपमा में चपलता, चमक और आकस्मिक सौन्दर्य की अभिव्यक्ति है। यह सौन्दर्य चंचल भी है और दिव्य भी।
मुखमण्डल की तेजोदीप्ति
श्रद्धा का मुखमण्डल उसके सम्पूर्ण रूप का केंद्र है। उसके काले केशों की पृष्ठभूमि में उसका मुख ऐसा दमकता है जैसे संध्या के आकाश में सूर्य का अरुणिम मण्डल—
आह! वह मुख पश्चिम के व्योम,
बीच जब घिरते हों घनस्याम।
अरुण रवि मण्डल उनको भेद,
दिखाई देता हो छबिधाम।।
यहाँ “पश्चिम का व्योम” और “अरुण रवि मण्डल” के माध्यम से कवि ने श्रद्धा के मुख की आभा को चित्रित किया है। उसके मुख की दीप्ति संध्या-सूर्य की लालिमा जैसी है, जो अंधकार को भेदकर प्रकाश बिखेरती है।
केश-सौन्दर्य का चित्रण
श्रद्धा के घुँघराले केश उसके कंधों पर झूल रहे हैं। वे ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे छोटे-छोटे नील मेघ चन्द्रमा से अमृत लेने के लिए उसके चारों ओर मंडरा रहे हों—
घिर रहे थे धुंघराले बाल,
अंस अवलम्बित मुख के पास।
नील घन-शावक से सुकुमार,
सुधा भरने को विधु के पास।।
यहाँ ‘विधु’ अर्थात् चन्द्रमा—श्रद्धा का मुख—और ‘नील घन-शावक’ उसके केश हैं। इस उपमा में कोमलता, शीतलता और माधुर्य का अद्भुत संयोजन है।
अधरों की मुस्कान
श्रद्धा के लाल अधरों पर छाई हुई मुस्कान कवि को विशेष रूप से आकृष्ट करती है। वह मुस्कान मानो नवोदित सूर्य की पहली किरण हो जो रक्त-किसलयों पर विश्राम कर रही हो—
और उस मुख पर वह मुस्कान,
रक्त किसलय पर ले विश्राम।
अरुण की एक किरण अम्लान,
अधिक अलसाई हो अभिराम।।
यह मुस्कान केवल बाह्य आकर्षण नहीं, बल्कि अंत:करण की मधुरता का संकेत है। यह मुस्कान आशा और स्नेह की द्योतक है।
मनु पर श्रद्धा के सौन्दर्य का प्रभाव
श्रद्धा के इस अलौकिक रूप को देखकर मनु के हृदय में आशा का संचार होता है। जो जीवन अब तक निराशा और शून्यता से भरा था, उसमें अब वसंत की संभावना जाग उठती है।
मनु स्वयं विस्मित होकर पूछते हैं—
कौन हो तुम बसन्त के दूत,
विरस पतझड़ में अति सुकुमार।
घन तिमिर में चपलता की रेख,
तपन में शीतल मन्द बयार॥
यहाँ श्रद्धा को बसन्त का दूत कहा गया है। पतझड़ के सूखे वातावरण में वह हरियाली की संभावना है। घने अंधकार में वह बिजली की रेखा है और तपन में शीतल वायु का झोंका।
स्पष्ट है कि श्रद्धा केवल रूप-सुन्दरी नहीं, बल्कि जीवन में नव-प्राण भरने वाली शक्ति है।
प्रतीकात्मक सौन्दर्य
श्रद्धा का सौन्दर्य स्थूल नहीं है। उसमें मांसलता या भौतिक आकर्षण का प्रदर्शन नहीं है। छायावादी शैली में उसका चित्रण सूक्ष्म, वायवीय और आध्यात्मिक है।
- लता, चन्द्रिका, मेघ, बिजली, रवि, किसलय आदि सभी प्रकृति-प्रतीक उसके सौन्दर्य को अलौकिक बनाते हैं।
- उसकी मुस्कान आशा का प्रतीक है।
- उसके केश मेघ हैं, मुख चन्द्रमा है, अंग-कान्ति बिजली है।
इस प्रकार श्रद्धा प्रकृति और मानवीय चेतना का संगम बन जाती है।
छायावादी शैली की विशेषताएँ
इस सर्ग में छायावाद की प्रमुख विशेषताएँ स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं—
- प्रकृति-चित्रण की प्रधानता – श्रद्धा का रूप प्रकृति के उपमानों द्वारा उभारा गया है।
- सूक्ष्मता और सांकेतिकता – प्रत्यक्ष वर्णन के स्थान पर संकेतों और प्रतीकों का प्रयोग।
- आध्यात्मिकता – सौन्दर्य में दार्शनिक गहराई।
- संगीतात्मकता – पंक्तियों में लयात्मक माधुर्य।
निष्कर्ष
‘श्रद्धा-मनु’ सर्ग में श्रद्धा का सौन्दर्य-वर्णन केवल एक सुन्दरी युवती का रूप-चित्र नहीं है, बल्कि यह मानव-जीवन में आशा, विश्वास और नव-सृजन की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है।
श्रद्धा का रूप मनु के जीवन में वसन्त का संचार करता है। वह अंधकार में प्रकाश, पतझड़ में हरियाली और निराशा में आशा बनकर आती है।
इस प्रकार जयशंकर प्रसाद ने कामायनी के ‘श्रद्धा’ सर्ग में श्रद्धा के सौन्दर्य का जो चित्र खींचा है, वह छायावादी काव्य-शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। उसमें स्थूलता का अभाव, सूक्ष्मता की प्रधानता और प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति की कलात्मकता है।
श्रद्धा का यह सौन्दर्य केवल आँखों को नहीं, हृदय और आत्मा को भी स्पर्श करता है। यही कारण है कि ‘श्रद्धा-मनु’ सर्ग हिन्दी साहित्य में सौन्दर्य-चित्रण का अद्वितीय उदाहरण माना जाता है।
यदि आप जयशंकर प्रसाद जी के जीवन, व्यक्तित्व, साहित्यिक यात्रा और समग्र योगदान के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं, तो हमारा लेख “जयशंकर प्रसाद : जीवन परिचय, साहित्यिक योगदान, कृतियाँ एवं भाषा-शैली” अवश्य पढ़ें, जिससे उनके काव्य को समझने की पृष्ठभूमि और अधिक स्पष्ट हो सके।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
‘श्रद्धा-मनु’ प्रसंग किस काव्य से लिया गया है?
‘श्रद्धा-मनु’ प्रसंग हिंदी के प्रसिद्ध महाकाव्य कामायनी से लिया गया है, जिसके रचयिता जयशंकर प्रसाद हैं। यह काव्य छायावाद युग की प्रमुख रचना है और इसमें मानव-जीवन के विभिन्न मनोभावों का प्रतीकात्मक चित्रण किया गया है।
‘श्रद्धा-मनु’ प्रसंग की पृष्ठभूमि क्या है?
इस प्रसंग की पृष्ठभूमि जल-प्रलय के बाद की है। देव-सृष्टि नष्ट हो चुकी है और केवल मनु जीवित बचे हैं। वे एकांत में तपस्या कर रहे हैं। इसी समय श्रद्धा का आगमन होता है, जो मनु के जीवन में आशा और नव-सृजन की भावना जगाती है।
श्रद्धा के सौन्दर्य का चित्रण किस शैली में किया गया है?
श्रद्धा के सौन्दर्य का चित्रण छायावादी शैली में किया गया है। इसमें प्रकृति-प्रतीकों, उपमाओं और रूपकों का प्रयोग करते हुए सूक्ष्म, आध्यात्मिक और सांकेतिक सौन्दर्य प्रस्तुत किया गया है। इसमें स्थूलता या मांसलता का अभाव है।
श्रद्धा के सौन्दर्य-वर्णन में किन-किन प्राकृतिक उपमानों का प्रयोग हुआ है?
कवि ने श्रद्धा के रूप की तुलना लता, चन्द्रिका, मेघ, बिजली, सूर्य, चन्द्रमा, किसलय आदि प्राकृतिक तत्वों से की है। इन उपमानों के माध्यम से श्रद्धा के सौन्दर्य को कोमल, तेजस्वी और अलौकिक रूप में प्रस्तुत किया गया है।
मनु पर श्रद्धा के रूप-सौन्दर्य का क्या प्रभाव पड़ा?
श्रद्धा के रूप को देखकर मनु के निराश और एकाकी जीवन में आशा का संचार हुआ। उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ मानो पतझड़ में वसंत आ गया हो। श्रद्धा उनके जीवन में नव-चेतना, प्रेम और सृजन की प्रेरणा बनकर आई।
‘श्रद्धा’ का प्रतीकात्मक महत्व क्या है?
‘श्रद्धा’ केवल एक नारी-पात्र नहीं है, बल्कि वह मानव-जीवन में विश्वास, प्रेम, आशा और सकारात्मक भावनाओं की प्रतीक है। उसका आगमन यह संदेश देता है कि निराशा और विनाश के बाद भी जीवन में नव-सृजन संभव है।
महत्वपूर्ण दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (विस्तृत प्रश्नोत्तर FAQs)
‘श्रद्धा-मनु’ प्रसंग में श्रद्धा का सौन्दर्य केवल शारीरिक है या प्रतीकात्मक? स्पष्ट कीजिए।
‘श्रद्धा-मनु’ प्रसंग में श्रद्धा का सौन्दर्य केवल बाह्य या शारीरिक नहीं है, बल्कि अत्यंत गहन प्रतीकात्मक और दार्शनिक अर्थों से युक्त है। कवि ने श्रद्धा के रूप का वर्णन अवश्य किया है, परंतु वह वर्णन स्थूल, मांसल या भौतिक आकर्षण तक सीमित नहीं है। छायावादी शैली के अनुरूप उसका सौन्दर्य सूक्ष्म, वायवीय और आध्यात्मिक है।
कवि ने श्रद्धा की तुलना लता, चन्द्रिका, मेघ, बिजली, किसलय और सूर्य की किरण से की है। ये सभी उपमान केवल रूप-सौन्दर्य को व्यक्त नहीं करते, बल्कि उसके व्यक्तित्व की कोमलता, पवित्रता और तेजस्विता का भी संकेत देते हैं। उदाहरण के लिए, जब कवि उसके अंगों की तुलना मेघों के बीच खिले बिजली के फूल से करता है, तो वह केवल रंग और आभा का चित्रण नहीं करता, बल्कि उसमें निहित चपलता और जीवन्तता को भी प्रकट करता है।
श्रद्धा यहाँ मानव-जीवन में विश्वास, प्रेम, समर्पण और आशा की प्रतीक है। जल-प्रलय के पश्चात जब मनु एकाकी, निराश और चिंताग्रस्त हैं, तब श्रद्धा का आगमन उनके जीवन में नव-प्राण का संचार करता है। अतः उसका सौन्दर्य जीवनदायी है।
इस प्रकार श्रद्धा का रूप-सौन्दर्य शारीरिक होने के साथ-साथ गहन प्रतीकात्मक भी है। वह मानवीय संवेदनाओं और आध्यात्मिक मूल्यों की सजीव प्रतिमा है।
‘श्रद्धा-मनु’ प्रसंग में छायावादी काव्य-शैली की विशेषताओं का विवेचन कीजिए।
‘श्रद्धा-मनु’ प्रसंग छायावादी काव्य-शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसमें छायावाद की सभी प्रमुख विशेषताएँ स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती हैं।
प्रथम, प्रकृति-चित्रण की प्रधानता है। श्रद्धा के रूप का वर्णन सीधे-सीधे न करके उसे प्रकृति के उपमानों द्वारा व्यक्त किया गया है। लता, चन्द्रिका, मेघ, बिजली, सूर्य, चन्द्रमा, किसलय आदि के माध्यम से उसके सौन्दर्य को मूर्त रूप दिया गया है।
द्वितीय, सूक्ष्मता और सांकेतिकता है। कवि ने कहीं भी स्थूल या स्पष्ट रूप से अंग-प्रत्यंग का विवरण नहीं दिया है। संकेतों और प्रतीकों के माध्यम से सौन्दर्य को प्रस्तुत किया गया है। यही छायावाद की प्रमुख विशेषता है।
तृतीय, आध्यात्मिकता और रहस्यात्मकता का समावेश है। श्रद्धा केवल नारी नहीं है, बल्कि विश्वास और प्रेम की प्रतीक है। उसका आगमन जीवन में आशा और नव-सृजन की प्रेरणा देता है।
चतुर्थ, काव्य में संगीतात्मकता और लयात्मक प्रवाह है। पंक्तियों में मधुर ध्वनियाँ और कोमल शब्दावली काव्य को अत्यंत सरस बनाती है।
अतः ‘श्रद्धा-मनु’ प्रसंग छायावादी काव्य-धारा का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें भावुकता, प्रकृति-सौन्दर्य, आध्यात्मिकता और सांकेतिकता का सुंदर समन्वय हुआ है।
‘श्रद्धा-मनु’ प्रसंग में मनु और श्रद्धा का मिलन किस दार्शनिक अर्थ को व्यक्त करता है?
‘श्रद्धा-मनु’ प्रसंग में मनु और श्रद्धा का मिलन केवल दो पात्रों का मिलन नहीं है, बल्कि दो जीवन-दृष्टियों और दो मानवीय शक्तियों का संगम है। जल-प्रलय के बाद मनु अकेले बचे हैं। वे चिंतन, स्मृति और बुद्धि के प्रतीक हैं। उनका जीवन निराशा और एकांत से घिरा हुआ है।
ऐसे समय श्रद्धा का आगमन होता है। श्रद्धा विश्वास, प्रेम और भावना की प्रतीक है। उसका रूप-सौन्दर्य मनु के हृदय में नव-आशा का संचार करता है। इस प्रकार यह मिलन बुद्धि और भावना, तर्क और विश्वास, निराशा और आशा का समन्वय है।
दार्शनिक दृष्टि से यह प्रसंग यह संदेश देता है कि जीवन में केवल बुद्धि या केवल भावना पर्याप्त नहीं है। दोनों का संतुलन ही जीवन को पूर्ण बनाता है। यदि मनु मानव की बौद्धिक शक्ति हैं, तो श्रद्धा उसकी भावनात्मक और आध्यात्मिक शक्ति है।
अतः यह मिलन नव-सृजन, संतुलन और सामंजस्य का प्रतीक है। यही कामायनी का केंद्रीय दार्शनिक संदेश भी है।
इन्हें भी देखें –
- जयशंकर प्रसाद : जीवन परिचय, साहित्यिक योगदान, कृतियाँ एवं भाषा-शैली
- श्रेष्ठ छायावादी कवि ‘जयशंकर प्रसाद’ की काव्यगत विशेषताएँ
- संत कबीरदास : जीवन परिचय, साहित्यिक योगदान, कृतियाँ एवं भाषा-शैली
- रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि बिहारी : जीवन परिचय, साहित्यिक योगदान, कृतियाँ एवं भाषा-शैली
- राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त : जीवन परिचय, साहित्यिक योगदान, कृतियाँ एवं भाषा-शैली
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