प्राचीन विश्व के इतिहास में समुद्री व्यापार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और यात्राओं की परंपरा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। लंबे समय तक इतिहासकारों के पास भारत और मिस्र के बीच संपर्क के साहित्यिक एवं पुरातात्विक संकेत तो मौजूद थे, परंतु उनके प्रत्यक्ष और स्पष्ट प्रमाण सीमित थे। हाल ही में मिस्र के प्रसिद्ध शाही समाधि-क्षेत्र Valley of the Kings में मिले तमिल-ब्राह्मी शिलालेखों ने इस ऐतिहासिक संबंध को एक ठोस, प्रत्यक्ष और जीवंत रूप में प्रस्तुत कर दिया है।
यह खोज केवल कुछ दीवारों पर उकेरे गए नामों या वाक्यों तक सीमित नहीं है; यह एक ऐसी ऐतिहासिक खिड़की है जो हमें लगभग दो हजार वर्ष पहले के वैश्विक संपर्क, समुद्री मार्गों, भारतीय व्यापारियों की यात्राओं, धार्मिक-सांस्कृतिक जिज्ञासा और बहुभाषिक दुनिया की झलक दिखाती है। इन शिलालेखों ने यह सिद्ध कर दिया कि भारतीय व्यापारी केवल बंदरगाहों तक सीमित नहीं थे, बल्कि वे मिस्र के आंतरिक भूभागों तक जाकर प्रसिद्ध स्मारकों का अवलोकन करते थे और वहां अपनी उपस्थिति दर्ज कराते थे।
खोज का स्थान और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
मिस्र का थेबन नेक्रोपोलिस विश्व के सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक क्षेत्रों में से एक है। इसी क्षेत्र में स्थित है वैली ऑफ द किंग्स — वह स्थान जहां नए साम्राज्य काल (New Kingdom) के फिरऔनों को दफनाया गया था। यह क्षेत्र केवल मिस्रवासियों के लिए ही नहीं, बल्कि प्राचीन काल से यात्रियों और तीर्थदर्शियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है।
यहीं की कब्रों की दीवारों और गलियारों में लगभग 30 भारतीय मूल के शिलालेख पाए गए हैं। इनका काल निर्धारण पहली से तीसरी शताब्दी ईस्वी के बीच किया गया है। अर्थात यह वही समय था जब हिंद महासागर के समुद्री मार्गों के माध्यम से भारत, रोमन साम्राज्य और मिस्र के बीच अत्यंत सक्रिय व्यापार होता था।
इन शिलालेखों की खोज और अध्ययन फ्रांसीसी संस्था EFEO (पेरिस) की विदुषी शार्लोट श्मिट और स्विट्ज़रलैंड के लुसाने विश्वविद्यालय के विद्वान इंगो स्ट्रॉच द्वारा किया गया। उन्होंने इन अभिलेखों का भाषायी और सांस्कृतिक विश्लेषण कर यह सिद्ध किया कि ये सामान्य पर्यटक-लेखन नहीं बल्कि संगठित भारतीय यात्राओं के संकेत हैं।
शिलालेखों की लिपि और भाषायी विविधता
इन अभिलेखों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उनकी बहुभाषिक प्रकृति है। इनमें निम्नलिखित लिपियों और भाषाओं का प्रयोग हुआ है —
- तमिल-ब्राह्मी (सबसे अधिक — लगभग 20)
- प्राकृत
- संस्कृत
- गांधारी-खरोष्ठी
यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि भारत के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के लोग एक ही अंतरराष्ट्रीय यात्रा-परंपरा का हिस्सा थे। दक्षिण भारत (तमिलगाम), पश्चिमी भारत (गुजरात-महाराष्ट्र क्षेत्र) और उत्तर-पश्चिम भारत (गांधार क्षेत्र) — सभी क्षेत्रों के व्यापारी या यात्री मिस्र पहुंचे थे।
यह एक प्रकार का “वैश्विक भारतीय नेटवर्क” था, जो आधुनिक वैश्वीकरण से लगभग 2000 वर्ष पूर्व अस्तित्व में था।
शिलालेखों की प्रकृति — प्राचीन पर्यटक ग्रैफिटी
इन लेखों का स्वरूप अत्यंत रोचक है। ये औपचारिक राजकीय शिलालेख नहीं हैं, बल्कि यात्रियों द्वारा छोड़े गए संक्षिप्त भित्ति-लेख (graffiti) हैं।
आज हम पर्यटन स्थलों पर लोगों को “मैं यहां आया” लिखते देखते हैं — ठीक वैसा ही व्यवहार प्राचीन काल में भी था।
भारतीय आगंतुक मकबरों की दीवारों, प्रवेश द्वारों और गलियारों पर अपना नाम या छोटा वाक्य लिखते थे। यह किसी धार्मिक कर्मकांड का हिस्सा भी हो सकता है और अपनी यात्रा का प्रमाण भी।
विशेष बात यह है कि इन्हीं दीवारों पर हजारों यूनानी यात्रियों के भी ग्रैफिटी मौजूद हैं। इसका अर्थ है कि वैली ऑफ द किंग्स प्राचीन विश्व का अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल था।
शिलालेखों में मिले नाम और उनका सांस्कृतिक अर्थ
इन अभिलेखों में कुछ नाम बार-बार मिलते हैं, जो हमें प्राचीन भारतीय समाज और जातीय पहचान की झलक देते हैं।
(1) सीकै कोट्टन (Cikai Koṟraṉ)
यह नाम पाँच अलग-अलग मकबरों में आठ बार मिला है।
- “सीकै” संभवतः संस्कृत शब्द “शिखा” से संबंधित है (चोटी या मुकुट)
- “कोट्टन” तमिल शब्द “कोट्टम” (विजय) से जुड़ा है
- यह चेर योद्धा परंपरा और देवी कोट्टवई से संबंधित माना जाता है
इससे संकेत मिलता है कि यह कोई प्रमुख व्यक्ति, व्यापारी नेता या समूह प्रमुख रहा होगा, जो अलग-अलग कब्रों में गया।
(2) अन्य नाम
- कोपान (Kopāṉ)
- चातन (Cātaṉ)
- किरण (Kiraṉ)
एक रोचक वाक्यांश मिला:
“Kopāṉ varata kantan” — कोपान आया और देखा
यह प्राचीन पर्यटन संस्कृति का सबसे सुंदर प्रमाण माना जा सकता है।
क्षहरात राजवंश का उल्लेख
एक संस्कृत शिलालेख में पश्चिमी भारत के Kshaharata राजवंश के दूत का उल्लेख मिलता है, जो पहली शताब्दी ईस्वी में वहां पहुंचा था।
यह केवल व्यापारी संपर्क नहीं बल्कि राजनयिक संपर्क का प्रमाण भी हो सकता है।
अर्थात भारत और मिस्र के बीच संपर्क व्यक्तिगत या निजी स्तर पर ही नहीं बल्कि राजनीतिक-राजनयिक स्तर पर भी मौजूद था।
इंडो-रोमन व्यापार का सशक्त प्रमाण
यह खोज लाल सागर के तटवर्ती बंदरगाहों — बेरेनीके और कुसैर अल-कादिम — से पहले मिले भारतीय अवशेषों की पुष्टि करती है। पहले माना जाता था कि भारतीय व्यापारी केवल समुद्री तटों तक सीमित रहते थे।
परंतु अब स्पष्ट है कि वे नील घाटी के भीतर तक यात्रा करते थे।
इससे तीन महत्वपूर्ण बातें सिद्ध होती हैं:
- भारतीय व्यापारी स्थलीय मार्गों से भी यात्रा करते थे
- मिस्र उनके लिए केवल व्यापारिक केंद्र नहीं बल्कि सांस्कृतिक आकर्षण भी था
- यात्राएं संगठित और नियमित थीं
संगम साहित्य की ऐतिहासिक पुष्टि
तमिल-ब्राह्मी शिलालेखों में मिले नाम दक्षिण भारत के संगम कालीन ग्रंथों में वर्णित नामों से मेल खाते हैं।
यह अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि लंबे समय तक इतिहासकार संगम साहित्य को आंशिक रूप से काव्यात्मक और प्रतीकात्मक मानते थे। अब ये अभिलेख बताते हैं कि —
- दक्षिण भारत की समुद्री शक्ति वास्तविक थी
- चेर, चोल और पांड्य व्यापारी अंतरराष्ट्रीय व्यापार में सक्रिय थे
- समुद्री यात्रा सामान्य सामाजिक गतिविधि थी
अर्थात साहित्य और पुरातत्व पहली बार इतने स्पष्ट रूप से एक-दूसरे की पुष्टि करते हैं।
बहुभाषिक वैश्विक नेटवर्क
एक ही स्थल पर संस्कृत, प्राकृत, तमिल-ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपि का मिलना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यह दर्शाता है कि भारत कोई अलग-थलग सभ्यता नहीं था, बल्कि एक बहु-क्षेत्रीय व्यापारिक संघ की तरह कार्य करता था।
- उत्तर-पश्चिम भारत: गांधार व्यापारी
- पश्चिम भारत: क्षहरात क्षेत्र
- दक्षिण भारत: तमिल समुद्री व्यापारी
इन सभी ने मिलकर एक विशाल हिंद महासागर नेटवर्क बनाया था।
प्राचीन ग्रंथों की पुष्टि
ग्रीक ग्रंथ Periplus of the Erythraean Sea में भारत-मिस्र व्यापार का विस्तृत वर्णन मिलता है।
उसमें भारतीय जहाजों, मसालों, मोतियों, हाथीदांत और वस्त्रों का उल्लेख है।
अब वैली ऑफ द किंग्स के शिलालेख उस साहित्यिक विवरण का भौतिक प्रमाण बन गए हैं।
सांस्कृतिक अर्थ — केवल व्यापार नहीं, जिज्ञासा भी
इन शिलालेखों से एक अत्यंत मानवीय तथ्य सामने आता है —
भारतीय व्यापारी केवल लाभ कमाने नहीं जाते थे, वे दुनिया देखने भी जाते थे।
उन्होंने:
- स्मारकों का अवलोकन किया
- अपना नाम लिखा
- यात्रा का अनुभव दर्ज किया
अर्थात वे “व्यापारी-पर्यटक” थे।
वैश्वीकरण का प्राचीन रूप
आधुनिक वैश्वीकरण को अक्सर यूरोपीय खोजों के बाद का माना जाता है, परंतु यह खोज बताती है कि:
- अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मौजूद था
- बहुभाषिक संपर्क सामान्य था
- सांस्कृतिक जिज्ञासा व्यापक थी
लगभग 2000 वर्ष पहले ही मानव समाज एक जुड़ी हुई दुनिया बन चुका था।
निष्कर्ष
मिस्र के वैली ऑफ द किंग्स में मिले तमिल-ब्राह्मी शिलालेख केवल पुरातात्विक खोज नहीं हैं — यह मानव इतिहास के एक बड़े सत्य की पुनर्स्थापना है।
यह खोज सिद्ध करती है कि प्राचीन भारत:
- समुद्री महाशक्ति था
- अंतरराष्ट्रीय व्यापार का केंद्र था
- सांस्कृतिक रूप से जिज्ञासु समाज था
- बहुभाषिक और वैश्विक नेटवर्क का हिस्सा था
इन भित्ति-लेखों में लिखे छोटे-छोटे नाम हमें बताते हैं कि इतिहास केवल राजाओं और युद्धों का नहीं होता, बल्कि यात्रियों, व्यापारियों और सामान्य मनुष्यों का भी होता है।
जब लगभग दो हजार वर्ष पहले कोई भारतीय व्यापारी मिस्र की एक विशाल कब्र के सामने खड़ा होकर लिखता है —
“कोपान आया और देखा”
तो वह केवल अपना नाम नहीं लिख रहा था —
वह मानव सभ्यता के वैश्विक इतिहास में भारत की उपस्थिति दर्ज कर रहा था।
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