भारत अपनी समृद्ध जैव विविधता और प्राकृतिक संपदा के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध रहा है। देश के विविध भौगोलिक स्वरूप—हिमालयी क्षेत्र, वन, मरुस्थल, तटीय क्षेत्र और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र—असंख्य जीव-जंतुओं के लिए प्राकृतिक आवास प्रदान करते हैं। इसी क्रम में हाल ही में भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (Zoological Survey of India – ZSI) के वैज्ञानिकों ने पश्चिम बंगाल के तटीय क्षेत्रों से समुद्री कीड़ों (Marine Worms) की दो नई प्रजातियों की खोज कर जैव विविधता के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। यह खोज न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि समुद्री पारिस्थितिकी, पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण अध्ययन के लिए भी अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती है।
खोज का पृष्ठभूमि और क्षेत्र
भारतीय प्राणी सर्वेक्षण के वैज्ञानिकों ने अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के सहयोग से पश्चिम बंगाल के पुरबा मेदिनीपुर जिले के दो प्रमुख तटीय क्षेत्रों—दीघा (Digha) और बांकीपुट (Bankiput)—में विस्तृत अनुसंधान कार्य किया। ये क्षेत्र बंगाल की खाड़ी के किनारे स्थित हैं और अपनी विशिष्ट समुद्री पारिस्थितिकी के लिए जाने जाते हैं।
दीघा पश्चिम बंगाल का एक प्रमुख समुद्री पर्यटन स्थल है, जबकि बांकीपुट अपेक्षाकृत शांत और कम व्यावसायिक गतिविधियों वाला तटीय क्षेत्र है। इन क्षेत्रों में समुद्री जैव विविधता पर अध्ययन करने के दौरान वैज्ञानिकों को समुद्री कीड़ों की दो नई प्रजातियों के अस्तित्व का पता चला। यह खोज दर्शाती है कि भारत के तटीय क्षेत्रों में अभी भी कई अज्ञात प्रजातियाँ मौजूद हैं, जिनका अध्ययन भविष्य में समुद्री विज्ञान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।
नेरिडिडे परिवार और रैगवर्म का परिचय
खोजी गई दोनों प्रजातियाँ ‘नेरिडिडे’ (Nereididae) परिवार से संबंधित हैं, जिन्हें सामान्य रूप से ‘रैगवर्म’ (Ragworms) कहा जाता है। यह परिवार समुद्री पॉलीकीट (Polychaete) कीड़ों का एक महत्वपूर्ण समूह है। ये कीड़े सामान्यतः समुद्र की तलछट, कीचड़, रेत और मैंग्रोव क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
रैगवर्म अपनी गतिशीलता, अनुकूलन क्षमता और पारिस्थितिक भूमिका के कारण समुद्री खाद्य श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। कई समुद्री जीव—जैसे मछलियाँ, केकड़े और अन्य अकशेरुकी जीव—इन पर निर्भर रहते हैं। इसलिए इनकी उपस्थिति समुद्री पारिस्थितिकी के संतुलन को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है।
खोजी गई नई प्रजातियाँ
भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा खोजी गई दो नई प्रजातियाँ निम्नलिखित हैं:
- नामालीकास्टिस सोलेनोटोग्नाथा (Namalycastis solenotognatha)
- नेरेस धृतिया (Nereis dhritiae)
इन दोनों प्रजातियों की अपनी अलग-अलग विशेषताएँ, आवास और वैज्ञानिक महत्व हैं।
(A) नामालीकास्टिस सोलेनोटोग्नाथा: अनुकूलन का अद्भुत उदाहरण
नामकरण और वैज्ञानिक आधार
इस प्रजाति का नाम ग्रीक शब्दों ‘सोलेनोटोस’ (Solenotos – चैनल युक्त) और ‘ग्नाथा’ (Gnatha – जबड़ा) से मिलकर बनाया गया है। यह नाम इस प्रजाति की विशेष संरचनात्मक विशेषता को दर्शाता है, जो इसके जबड़े में मौजूद नहरों या नलिकाओं से संबंधित है।
मुख्य विशेषताएँ
नामालीकास्टिस सोलेनोटोग्नाथा की सबसे प्रमुख विशेषता इसके जबड़े की संरचना है। इसके जबड़े में विशेष प्रकार की नहरें होती हैं, जो पल्प कैविटी से निकलती हैं। यह संरचना इसे भोजन प्राप्त करने और वातावरण के अनुकूल बनने में सहायता करती है।
इस प्रजाति की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता इसकी अत्यधिक प्रतिकूल परिस्थितियों में जीवित रहने की क्षमता है। यह उन स्थानों पर पाई जाती है जहाँ वातावरण में सल्फाइड की मात्रा अधिक होती है और दुर्गंधयुक्त कीचड़ (Mudflats) मौजूद रहती है।
आवास और जीवन शैली
यह प्रजाति सामान्यतः निम्न स्थानों पर पाई जाती है:
- सड़े हुए मैंग्रोव वृक्षों की लकड़ियाँ
- कठोर और प्रदूषित मिट्टी
- सल्फाइड युक्त कीचड़ क्षेत्र
इन क्षेत्रों में ऑक्सीजन का स्तर कम होता है और अधिकांश जीव यहाँ जीवित नहीं रह पाते, लेकिन यह प्रजाति इन परिस्थितियों में भी सफलतापूर्वक जीवनयापन करती है।
वैज्ञानिक महत्व
यह प्रजाति वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद करती है कि जीव प्रतिकूल और प्रदूषित वातावरण में किस प्रकार अपने शरीर की संरचना और व्यवहार में परिवर्तन कर जीवित रहते हैं।
(B) नेरेस धृतिया: वैज्ञानिक सम्मान का प्रतीक
नामकरण
इस नई प्रजाति का नाम ‘नेरेस धृतिया’ भारतीय प्राणी सर्वेक्षण की पहली महिला निदेशक डॉ. धृति बनर्जी के सम्मान में रखा गया है। यह नामकरण भारतीय वैज्ञानिक समुदाय में महिलाओं के योगदान को सम्मानित करने का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
मुख्य विशेषताएँ और आवास
नेरेस धृतिया सामान्यतः रेतीले समुद्री तटों पर पाई जाती है। इसकी सबसे रोचक विशेषता इसका आवास है। यह प्रजाति लकड़ी के गोदी के खंभों के भीतर रहती है, जो ज्वार-भाटा की प्रक्रिया के दौरान पानी में डूबते और निकलते रहते हैं।
यह उच्च ज्वार (High Tide) के दौरान सक्रिय रहती है और पानी के भीतर भोजन तथा आश्रय प्राप्त करती है।
पारिस्थितिक अनुकूलन
नेरेस धृतिया ने अपने जीवन चक्र को ज्वार-भाटा के अनुरूप ढाल लिया है। यह समुद्री जीवों में अनुकूलन क्षमता का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसके अध्ययन से वैज्ञानिकों को समुद्री पारिस्थितिकी के जटिल तंत्र को समझने में सहायता मिल सकती है।
समुद्री पारिस्थितिकी में इन प्रजातियों का महत्व
1. पोषक तत्व चक्र (Nutrient Cycling)
समुद्री कीड़े समुद्र की तलछट को मथने का कार्य करते हैं। इस प्रक्रिया को ‘बायोटर्बेशन’ कहा जाता है। इसके परिणामस्वरूप तलछट में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ता है, जिससे अन्य समुद्री जीवों के लिए अनुकूल वातावरण बनता है।
यह प्रक्रिया समुद्री खाद्य श्रृंखला और पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण के लिए अत्यंत आवश्यक है।
2. तलछट का वातन (Aeration)
इन कीड़ों की गतिविधियों के कारण समुद्री तलछट में हवा का प्रवाह बना रहता है। इससे समुद्री पौधों और सूक्ष्म जीवों के लिए बेहतर परिस्थितियाँ बनती हैं।
3. बायो-इंडिकेटर के रूप में भूमिका
इन प्रजातियों की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका पर्यावरणीय निगरानी में है। ये प्रजातियाँ उन क्षेत्रों में पाई गई हैं जहाँ औद्योगिक प्रदूषण और कचरा मौजूद है। इसलिए इनकी उपस्थिति वैज्ञानिकों को यह समझने में सहायता करती है कि समुद्री पारिस्थितिकी प्रदूषण के प्रभावों से कैसे प्रभावित हो रही है।
इनकी सहायता से निम्नलिखित अध्ययन संभव हैं:
- प्रदूषण का स्तर
- पर्यावरणीय परिवर्तन
- समुद्री जीवों की अनुकूलन क्षमता
4. लचीलापन और जीवित रहने की क्षमता
इन प्रजातियों को “बायो-वॉरियर” कहा जा सकता है क्योंकि ये अत्यधिक कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहती हैं। यह गुण भविष्य में पर्यावरणीय परिवर्तन और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन करने में सहायक हो सकता है।
भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI) की भूमिका
भारतीय प्राणी सर्वेक्षण भारत में प्राणी विज्ञान अनुसंधान का प्रमुख संस्थान है। इसकी स्थापना वर्ष 1916 में हुई थी और इसका मुख्यालय कोलकाता में स्थित है।
प्रमुख कार्य
- भारत की जैव विविधता का अध्ययन
- नई प्रजातियों की खोज और वर्गीकरण
- दुर्लभ और संकटग्रस्त जीवों का संरक्षण
- पर्यावरणीय निगरानी और शोध
ZSI देश के विभिन्न भागों में फील्ड सर्वेक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन के माध्यम से जैव विविधता का दस्तावेजीकरण करता है।
‘Animal Discoveries 2024’ की प्रमुख उपलब्धियाँ
भारतीय प्राणी सर्वेक्षण द्वारा प्रकाशित ‘Animal Discoveries 2024’ रिपोर्ट में भारत की जैव विविधता से जुड़े महत्वपूर्ण आँकड़े प्रस्तुत किए गए हैं।
प्रमुख आँकड़े
- कुल नई खोजें: 683
- 459 नई प्रजातियाँ
- 224 नए रिकॉर्ड
- सर्वाधिक नई प्रजातियाँ: केरल (101)
- पश्चिम बंगाल: 56 नई खोजें (चौथा स्थान)
ये आँकड़े दर्शाते हैं कि भारत जैव विविधता के क्षेत्र में विश्व के अग्रणी देशों में से एक है।
भारत की जैव विविधता और वैश्विक महत्व
भारत को विश्व के 17 ‘मेगा-डाइवर्स’ देशों में शामिल किया गया है। इन देशों में वैश्विक जैव विविधता का बड़ा हिस्सा पाया जाता है। भारत में लगभग 1,05,244 ज्ञात जीव प्रजातियाँ मौजूद हैं, जो विश्व की कुल जैव विविधता का लगभग 8 प्रतिशत हिस्सा हैं।
भारत की जैव विविधता निम्न कारणों से विशेष महत्व रखती है:
- भौगोलिक विविधता
- जलवायु विविधता
- पारंपरिक पारिस्थितिकी ज्ञान
- संरक्षित वन और समुद्री क्षेत्र
समुद्री जैव विविधता संरक्षण की आवश्यकता
समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र वर्तमान समय में कई चुनौतियों का सामना कर रहा है, जैसे:
- औद्योगिक प्रदूषण
- प्लास्टिक कचरा
- जलवायु परिवर्तन
- तटीय विकास गतिविधियाँ
- अत्यधिक मत्स्यन
इन चुनौतियों के कारण कई समुद्री प्रजातियाँ विलुप्ति के खतरे का सामना कर रही हैं। नई प्रजातियों की खोज न केवल वैज्ञानिक अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि संरक्षण रणनीतियाँ तैयार करने में भी सहायक होती है।
भविष्य के अनुसंधान और संभावनाएँ
इन नई प्रजातियों की खोज से समुद्री विज्ञान के क्षेत्र में कई नए अनुसंधान मार्ग खुल सकते हैं। वैज्ञानिक इन प्रजातियों के माध्यम से निम्न विषयों पर अध्ययन कर सकते हैं:
- समुद्री प्रदूषण के प्रभाव
- जलवायु परिवर्तन और समुद्री जीवन
- जैव-प्रौद्योगिकी में संभावित उपयोग
- पारिस्थितिक संतुलन में भूमिका
सामाजिक और वैज्ञानिक महत्व
यह खोज भारत की वैज्ञानिक क्षमता और अनुसंधान कौशल को दर्शाती है। साथ ही यह युवाओं को समुद्री विज्ञान और जैव विविधता अनुसंधान के क्षेत्र में करियर बनाने के लिए प्रेरित कर सकती है।
निष्कर्ष
पश्चिम बंगाल के तटीय क्षेत्रों में समुद्री कीड़ों की दो नई प्रजातियों—नामालीकास्टिस सोलेनोटोग्नाथा और नेरेस धृतिया—की खोज भारत की समुद्री जैव विविधता के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह खोज दर्शाती है कि हमारे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में अभी भी कई अज्ञात जीव मौजूद हैं, जिनका अध्ययन भविष्य में पर्यावरण संरक्षण और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए अत्यंत आवश्यक होगा।
इन प्रजातियों की विशेष अनुकूलन क्षमता और पारिस्थितिक भूमिका समुद्री जीवन के संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान देती है। साथ ही यह खोज भारतीय प्राणी सर्वेक्षण की वैज्ञानिक उपलब्धियों और भारत की जैव विविधता की समृद्धि को भी उजागर करती है।
भविष्य में यदि इस प्रकार के अनुसंधान और संरक्षण प्रयास जारी रहे, तो भारत न केवल अपनी जैव विविधता को सुरक्षित रख सकेगा, बल्कि वैश्विक पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकेगा।
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